Tuesday, 8 December 2015

अजीत डोभाल और संघ परिवार के रिश्ते

यह अजीत डोभाल किसके लिए काम कर किया या कर रहा है?

देश के भीतर और बाहर मौजूद खतरे से आगाह करने की जिम्मेदारी भारत के NSA अजीत डोभाल के ही कंधों पर है। आईबी के पूर्व डायरेक्टर की हैसियत से वह देश की सुरक्षा से जुड़े कई अहम मिशनों से जुड़े रहे हैं। आईबी से रिटायर होने के बाद वह विवेकानंद फाउंडेशन के डायरेक्टर बने और रामदेव, अन्ना, मोदी समेत कई लोगों के लिए कूटनीति तैयार की।

अजीत डोभाल और विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़ी कुछ खास बातें।   


 

यह फाउंडेशन बना कै कैसे?  
यह फाउंडेशन कन्याकुमारी में स्थित विवेकानंद केंद्र का हिस्सा है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के एकनाथ रानाडे ने की थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी विचारधारा पर बना थिंक टैंक विवेकानंद फाउंडेशन आज कल मोदी सरकार के लिए पड़ोसी देशों से संबंध और रणनीतिक मामलों पर इनपुट देने का काम करता है। जिसमें भारत के कई रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस, साइंटिस्ट और सैन्य अफसर शामिल हैं। अजीत डोभाल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) बनने के बाद उनकी जगह एन.सी. विज को फाउंडेशन का डायरेक्टर बनाया गया। फाउंडेशन से जुड़े पूर्व ब्यूरोक्रेट और सेना के पूर्व अधिकारियों के अलावा ज्यादातर लोग श्रमदान के रूप में काम करते हैं। कोई तनख्वाह नहीं लेते

बाबा रामदेव औैर अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान परदे के पीछे की रणनीति और इंटलेक्चुअल इनपुट देने का काम इसी फाउंडेशन ने किया है। रामदेव विवेकानंद फाउंडेशन से लगातार संपर्क में रहते हैं। हालांकि, खुद अजीत डोभाल फाउंडेशन के आंदोलनों में किसी तरह की भूमिका से इंकार करते रहे हैं। दूसरी ओर बाबा रामदेव कहते हैं हम सभी संगठनों से कालाधन वापस लाने में मदद मांग रहे थे। तब फाउंडेशन ने हमारी काफी मदद की। दक्षिणपंथी विचारधारा और संघ के करीब होने के सवाल पर फाउंडेशन के एडिटर केजी सुरेश कहते हैं, अगर राष्ट्रवादी होना राइटविंग या दक्षिणपंथ है, तो हम हैं। लेकिन हमारे यहां सभी दलों के लोग मदद के लिए आते हैं।
विवेकानंद फाउंडेशन यूपीए सरकार की नाक में दम भरने वाली गतिविधियों का केंद्र भी रहा था। परदे के पीछे की तमाम योजनाएं इसी केंद्र में बनीं। जब यूपीए सरकार इशरत जहां एनकाउंटर मामले में नरेंद्र मोदी की घेराबंदी कर रही थे उस वक्त अजीत डोभाल इशरत जहां केस में मोदी के सबसे बड़े पैरोकार बने थे। लालकृष्ण आडवाणी, गोविंदाचार्य, गुरुमूर्ति से लेकर संघ और बीजेपी से जुड़े तमाम सीनियर नेता और विचारक फाउंडेशन के विमर्श कार्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं। हालांकि फाउंडेशन के लोग आरएसएस के सीधे जुड़ाव से इनकार करते हैं, लेकिन इसके कार्यक्रमों में स्वयंसेवकों की बड़ी भूमिका साफ तौर पर देखी जाती रही है।


विवेकानंद फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में एक से बढ़कर एक दिग्गज हैं। बोर्ड में पूर्व सेना प्रमुख वीएन शर्मा, रॉ के पूर्व प्रमुख एके वर्मा, पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस कृष्णास्वामी, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, थिंकर एस गुरुमूर्ति, भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलुरु के प्रोफेसर आर वैद्यनाथ, पूर्व सेना प्रमुख शंकर रॉय, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार, जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एस. के. सिन्हा, पूर्व बीएसएफ प्रमुख प्रकाश सिंह, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, इसरो के पूर्व महानिदेशक वीके सारस्वत, पूर्व सीबाआई प्रमुख सीडी सहाय, रूस में भारत के राजदूत रहे प्रभात शुक्ला समेत कई पूर्व अफसर शामिल हैं।

 

दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित विवेकानंद फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक फंडिंग का बड़ा स्रोत डोनेशन है। देश-विदेश से लोग इस संस्थान को डोनेशन देते हैं। वर्ष 2013 में फाउंडेशन को एक करोड़ 49 लाख 56 हजार रुपए डोनेशन के तौर पर मिले थे। 2 लाख रुपए की ग्रांट विदेश मंत्रालय से मिली। इसी साल मानदेय, सैलरी, फीस और स्टाइपेंड पर 93 लाख 36 हजार रूपए से ज्यादा की राशि खर्च हो गई।















अजीत डोभाल लंबे समय से आरएसएस और संघ परिवार से जुड़े रहे हैं और संघ की रणनीति को सफल बनाने मे अजीत डोभाल के योगदान को भला कौन नहीं जानता, अगर २००९ मे भाजपा की सरकार बन जाती तो अजीत डोभाल को यह पद उसी समय मिल जाता, अन्ना हजारे को गाँधीवादी के तौर पर प्रमोट करना यह सब अजीत डोभाल की ही रणनीति का सफल हिस्सा रहा है, अटल सरकार के समय जब भारतीय विमान को तालिबान द्वारा हाइजैक कर लिया गया था और विमान मे लगभग ढेढ सौ से अधिक यात्री भारतीय थे जिसे कंधार से सुरक्षित लाने की जिम्मेदारी अटल सरकार के उपर थी, तालिबान का शर्त था कि वह भारत के जेलों मे बंद पाकिस्तानी कैदियों को सुरक्षित रिहा करे, उस समय अजीत डोभाल ही ने तालिबान से सिलसिलेवार  वार्ता किया और तालिबान के संपर्क मे बने रहने के बाद पाकिस्तानी कैदियों को  रिहा किया और भारतीय यात्रियों को सुरक्षित स्वदेश लाया गया था, तब यह राज खुलकर लोगों के बीच आ गया कि अजीत डोभाल से पाकिस्तानी आतंकवादियों से क्या रिश्ता था, अजीत डोभाल कैसे इतने घुले मिले रहे? यह किस के लिए काम कर रहे थे,?




















Monday, 7 December 2015

बाबरी मस्जिद को शहीद करने वालों ने बाबरी मस्जिद के साथ साथ भारी संविधान को भी कुचल दिया था ।

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिन 68 लोगों को दोषी ठहराया है उनके नाम

विशेष।बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय लिब्रहान जांच आयोग ने करीब साढ़े छ: करोड़ रुपये खर्च करके 16 वर्ष 6 महीने 14 दिन बाद अपनी रिपोर्ट 30 जून 2009 को सरकार को सौंपी दि थी।
लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिन 68 लोगों को दोषी ठहराया है। उनके नाम हैं-:
1-आचार्य धर्मेंद्र देव, धर्म संसद
2-आचार्य गिरिराज किशोर , विश्व हिन्दू परिषद
3-ए.के.सरन, तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक (सुरक्षा) उत्तर प्रदेश
4-अखिलेश मेहरोत्रा, तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक फैजाबाद
5-अशोक सिंघल, विश्व हिन्दू परिषद
6-अशोक सिन्हा, तत्कालीन सचिव, पर्यटन, उत्तर प्रदेश
7-अटल बिहारी वाजपेयी, भाजपा
8-बद्री प्रसाद तोषनीवाल, विश्व हिन्दू परिषद
9-बैकुंठ लाल शर्मा, विश्व हिन्दू परिषद
10-बाल ठाकरे, शिवसेना
11-बी.पी. सिंघल, विश्व हिन्दू परिषद
12-ब्रह्म दत्त द्विवेदी, भाजपा, तत्कालीन राजस्व मंत्री उत्तर प्रदेश
13-चंपत राय, स्थानीय निर्माण प्रबंधक
14-दाउदयाल खन्ना, भाजपा
15-डी. बी. राय, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक फैजाबाद
16-देवराहा बाबा, संत समाज
17-गुर्जन सिंह, भाजपा/राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
18-गुमानमल लोढ़ा, भाजपा
19-के.एन गोविंदाचार्य, भाजपा
20-एच. वी. शेषाद्रि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
21-जय भगवान गोयल, शिवसेना
22-जयभान सिंह पवैया, बजरंग दल
23-के.एस .सुदर्शन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
24-कलराज मिश्रा, भाजपा
25-कल्याण सिंह, भाजपा (तत्कालीन मुख्यमंत्री)
26-कुशाभाऊ ठाकरे, भाजपा
27-लालजी टंडन, भाजपा, तत्कालीन ऊर्जा मंत्री, उत्तर प्रदेश
28-लल्लू सिंह चौहान, भाजपा
29-लालकृष्ण आडवाणी, भाजपा
30-महंत अवैद्यनाथ, हिन्दू महासभा
31-महंत नृत्य गोपाल दास, राम जन्मभूमि न्यास
32- महंत परमहंस रामचंद्र दास, विश्व हिन्दू परिषद
33-मोरेश्वर दीनानंत सावे, शिवसेना
34-मोरोपंत पिंगले , शिवसेना
35-मुरली मनोहर जोशी, भाजपा
36-ओम प्रताप सिंह
37-ओंकार भावे, विश्व हिन्दू परिषद
38-प्रमोद महाजन, भाजपा
39-प्रवीण तोगड़िया, विश्व हिन्दू परिषद
40-प्रभात कुमार, तत्कालीन प्रधान सचिव (गृह) उत्तर प्रदेश
41-पुरुषोत्तम नारायण सिंह, विश्व हिन्दू परिषद
42-राजेंद्र गुप्ता, तत्कालीन मंत्री, उत्तर प्रदेश
43-राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
44-राम शंकर अग्निहोत्री, विश्व हिन्दू परिषद
45-रामविलास वेदांती, संत समाज
46-आर. के. गुप्ता, भाजपा, तत्कालीन वित्त मंत्री, उत्तर प्रदेश
47-आर. एन. श्रीवास्तव, तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट, फैजाबाद
48-साध्वी ऋतम्भरा, संत समाज
49-शंकर सिंह वाघेला, भाजपा
50-सतीश प्रधान, शिवसेना
51-श्रीचंद्र दीक्षित, भाजपा
52-सीता राम अग्रवाल
53-एस. पी. गौर, तत्कालीन आयुक्त, उत्तर प्रदेश
54-सुंदर सिंह भंडारी, भाजपा
55-सूर्य प्रताप साही, तत्कालीन मंत्री, उत्तर प्रदेश
56-स्वामी चिन्मयानंद, विश्व हिन्दू परिषद
57-स्वामी सच्चिदानंद साक्षी उर्फ साक्षीजी महाराज, विश्व हिन्दू परिषद
58-एस. वी. एम. त्रिपाठी, तत्कालीन पुलिस महानिदेशक
59-स्वामी सतमित रामजी, संत समाज
60-स्वामी सत्यानंद, संत समाज
61-स्वामी वामदेव, संत समाज
62-उमा भारती, विश्व हिन्दू परिषद
63-यू.पी. वाजपेयी, तत्कालीन उप महानिरीक्षक, फैजाबाद
64-विजयाराजे सिंधिया, भाजपा
65-वी. के. सक्सेना, तत्कालीन मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश
66-विनय कटियार, भाजपा
67- विष्णु हरि डालमिया, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
68-युद्धनाथ पांडेय, शिवसेना

Saturday, 9 May 2015

स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम विद्वानों के योगदान को भला कैसे भुलाया जा सकता है?


हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए हर तरह की मुश्किलें बर्दाश्त करके देश को आज़ादी दिलाने वालों में हज़रत शेखुल हिन्द मौलना महमूद हसन का नाम सबसे ऊपर आता है| आप दारुल उलूम देवबंद के शेखुल हदीस और पहले सपूत थे| अध्यन और अध्यापन आपकी दिनचर्या थी लेकिन जब देश पर काबिज़ विदेशी ताकतों ने हिन्दुस्तानियों को प्रताड़ित करने और मुल्क को लूटने खसोटने की हद कर दी तो कौम व मुल्क की मोहब्बत से सराबोर स्व. मौलाना महमूद हसन अंजाम से बेपरवाह होकर अपने समय की सबसे शक्तिशाली सत्ता से टकरा गए | अपने शागिर्दों के दिलों में देश की आज़ादी ज़ज्बा भर दिया और स्वयं भी तन मन और धन से देश की आज़ादी के लिए हर तरह की क़ुरबानी देने को तैयार हो गए|
मौलाना महमूदुल हसन देवबंदी का "एकता का सिद्धांत" आज़ादी का पेश खेमा साबित हुआ| आपने बिना किसी भेदभाव, धर्म व सम्प्रदाय तमाम हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजों के खिलाफ एक प्लेटफार्म पर जमा किया| गाँधी जी को महात्मा का नाम दिया और देश के कोने कोने में जाकर आज़ादी के आन्दोलन को धार दी जिसके कारण उन्हें तीन वर्ष से अधिक समय तक माल्टा की जेल में प्रताड़ना सहनी पड़ी|
हज़रात शेखुल हिन्द जमीअतुल ओलेमाए हिन्द के अग्रणी और संस्थापक थे| आप ही के हुक्म पर हज़रात मुफ़्ती किफ़ायत उल्लाह ने दिल्ली में संयुक्त मंच के तौर पर 1919 में जमीअतुल ओलेमाए हिन्द बुनियाद डाली जो अपनी संस्थापना के पहले दिन से ही ओलेमाओं की सरपरस्ती में कौम व मिल्लत की मुमायण खिदमात अंजाम दे रही है|
श्री शेष नारायण सिंह जी मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं, शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे, बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये... प्रिंट, रेडियो और टेलीविज़न में काम किया। इन्होंने 1920 से 1947 तक की महात्मा गांधी के जीवन के उस पहलू पर काम किया है, जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। अब मुख्य रूप से लिखने पढ़ने के काम में लगे हैं। उनका यह लेख ‘‘हमारी आज़ादी की विरासत का केन्द्र है देवबंद’’
वास्तव में देवबंद का दारूल उलूम प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र होने के साथ-साथ हमारी आज़ादी की लड़ाई की सबसे महत्वपूर्ण विरासत भी है। हिन्दू-मुस्लिम एकता का जो संदेश महात्मा गांधी ने दिया था, दारूल उलूम से उसके समर्थन में सबसे ज़बरदस्त आवाज़ उठी थी। 1930 में जब इलाहाबाद में संपन्न हुए मुस्लिम लीग के सम्मेलन में डा. मुहम्मद इक़बाल ने अलग मुस्लिम राज्य की बात की तो दारूल उलूम के विख्यात क़ानूनविद मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने उसकी मुख़ालिफत की थी। उनकी प्रेरणा से ही बड़ी संख्या में मुसलमानों ने महात्मा गांधी की अगुवाई में नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार क़रीब 12 हज़ार मुसलमानों ने नमक सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तारी दी थी। दारूल उलूम के विद्वानों की अगुवाई में चलने वाला संगठन जमीअतुल उलेमा-ए-हिंद आज़ादी की लड़ाई के सबसे अगले दस्ते का नेतृत्व कर रहा था। आजकल देवबंद शब्द का उल्लेख आते ही कुछ अज्ञानी प्रगतिशील लोग ऊल-जलूल बयान देने लगते हैं और ऐसा माहौल बनाते हैं गोया देवबंद से संबंधित हर व्यक्ति बहुत ही ख़तरनाक होता है और बात बात पर बम चला देता है। पिछले कुछ दिनों से वहां के फतवों पर भी मीडिया की टेढ़ी नज़र है। देवबंद के दारूल उलूम के रोज़मर्रा के कामकाज को अर्धशिक्षित पत्रकार, साम्प्रदायिक चश्मे से पेश करने की कोशिश करते हैं जिसका विरोध किया जाना चाहिए। 1857 में आज़ादी की लड़ाई में क़ौम हाजी इमादादुल्लाह के नेतृत्व में इकट्ठा हुई थी। वे 1857 में मक्का चले गए थे। उनके दो प्रमुख अनुयायियों मौलाना मुहम्मद क़ासिम नानौतवी और मौलाना रशीद अहमद गंगोही ने देवबंद में दारूल उलूम की स्थापना करने वालों की अगुवाई की थी। यही वह दौर था जब यूरोपीय साम्राज्यवाद एशिया में अपनी जड़े मज़बूत कर रहा था। अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपी साम्राज्यवाद का विरोध सैय्यद जमालुद्दीन कर रहे थे। जब वे भारत आए तो देवबंद के मदरसे में उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ और अंग्रेज़ों की सत्ता को उखाड़ फैंकने की कोशिश को और ताक़त मिली। जब 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई तो दारूल उलूम के प्रमुख मौलाना रशीद अहमद गंगोही थे। आपने फ़तवा दिया कि शाह अब्दुल अज़ीज़ का फ़तवा है कि भारत दारूल-हर्ब है।
इसलिए मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करें। उन्होंने कहा कि आज़ादी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिन्दुओं को साथ लेकर संघर्ष करना शरीअत के लिहाज़ से भी बिल्कुल दुरूस्त है। वें भारत की पूरी आज़ादी के हिमायती थे, इसलिए उन्होंने कांग्रेस में शामिल न होने का फैसला किया। क्योंकि कांग्रेस 1885 में पूरी आज़ादी की बात नहीं कर रही थी, लेकिन उनकी प्रेरणा से बड़ी संख्या में मुसलमानों ने कांग्रेस की सदस्यता ली और आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गये। इतिहास गवाह है कि देवबंद के उलेमा दंगों के दौरान भी भारत की आज़ादी और राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े पक्षधर के रूप में खड़े रहते थे। देवबंद के बड़े समर्थकों में मौलाना शिबली नोमानी का नाम भी लिया जा सकता है। उनके कुछ मतभेद भी थे, लेकिन आज़ादी की लड़ाई के मसले पर उन्होंने देवबंद का पूरी तरह से समर्थन किया। सर सैय्यद अहमद ख़ां की मृत्यु तक वे अलीगढ़ में शिक्षक रहे लेकिन अंग्रेज़ी राज के मामले में वे सर सैय्यद से अलग राय रखते थे। प्रोफेसर ताराचंद ने अपनी किताब ‘भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास’ में साफ लिखा है कि देवबंद के दारूल उलूम ने हर उस आंदोलन का समर्थन किया जो भारत से अंग्रेज़ों को खदेड़ने के लिए चलाया गया था। 1857 के जिन बाग़ियों ने देवबंद में धार्मिक मदरसे की स्थापना के उनके प्रमुख उद्देश्यों में भारत की सरज़मीन से मुहब्बत भी थी। कलाम-ए-पाक और हदीस की शिक्षा तो स्कूल का मुख्य काम था लेकिन उनके बुनियादी सिद्धांतों में यह भी था कि विदेशी सत्ता ख़त्म करने के लिए जिहाद की भावना को हमेशा ज़िंदा रखा जाए। आज कल जिहाद शब्द के भी अजीबो ग़रीब अर्थ बताये जा रहे हैं। यहां इतना ही कह देना क़ाफी होगा कि 1857 में जिन बाग़ी सैनिकों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ सब कुछ दांव पर लगा दिया था वे सभी अपने आपको जिहादी ही कहते थे। यह जिहादी हिन्दू भी थे और मुसलमान भी और सबका मक़सद एक ही था विदेशी शासक को पराजित करना।

मौलाना रशीद अहमद गंगोही के बाद दारूल उलूम के प्रमुख मौलाना महमूद उल हसल बने। उनकी ज़िंदगी का मक़सद ही भारत की आज़ादी था। यहां तक कि कांग्रेस ने बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरी स्वतंत्रता का नारा दिया। लेकिन मौलाना महमूद उल हसन ने 1905 में ही पूर्ण स्वतंत्रता की अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने भारत से अंग्रेज़ों को भगा देने के लिए एक मिशन की स्थापना की जिसका मुख्यालय देवबंद में बनाया गया। मिशन की शाखाएं दिल्ली, दीनापुर, अमरोट, करंजी खेड़ा और यागिस्तान में बनाई गयीं थीं।

Thursday, 7 May 2015

भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण पल

वर्ष 2014 का वह महत्वपूर्ण घटना जिन्हें इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया गया है। हमने पाठकों के लिए इस लेखन में बीबीसी हिंदी डॉट कॉम का भी सहारा लिया है, ताकि आपकी जानकारी तथ्यों पर आधारित हो।

अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न देने की घोषणा

24 दिसम्बर, 2014 बुधवार

मदन मोहन मालवीय
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महामना मदन मोहन मालवीय को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। केंद्रीय कैबिनेट ने दोनों को यह सम्मान देने का फैसला गुरुवार को वाजपेयी के 90वें जन्मदिन से एक दिन पहले किया है। मालवीय का जन्मदिन भी 25 दिसंबर को ही पड़ता है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी बयान में कहा गया, 'राष्ट्रपति बेहद हर्ष के साथ पंडित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) और अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित करते हैं।'

अटल बिहारी वाजपेयी
भारत के सर्वाधिक करिश्माई नेताओं में से एक अटल बिहारी वाजपेयी को एक महान नेता और अक्सर भारतीय जनता पार्टी का उदारवादी चेहरा बताया जाता है। पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे वाजपेयी को कई ठोस पहल करने का श्रेय दिया जाता है, जिनमें भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों को कम करने का उनका प्रयास प्रमुख रूप से शामिल है। वाजपेयी ऐसे पहले प्रधानमंत्री बने जिनका संबंध कभी कांग्रेस से नहीं रहा।
दूरदृष्टा और महान शिक्षाविद् महामना मदन मोहन मालवीय की मुख्य उपलब्धियों में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना शामिल है। 25 दिसंबर 1861 को जन्मे मदन मोहन मालवीय 1886 में कोलकाता में कांग्रेस के दूसरे सत्र में अपने पहले विचारोत्तेजक भाषण के तुरंत बाद ही राजनीति में आ गए थे। वह 1909 से 1918 के बीच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। मालवीय को स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सशक्त भूमिका और हिंदू राष्ट्रवाद के प्रति उनके समर्थन के लिए भी याद किया जाता है। वह दक्षिणपंथी हिंदू महासभा के शुरुआती नेताओं में से एक थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद राष्ट्रपति से इन दोनों महान हस्तियों को भारत रत्न से सम्मानित करने की सिफारिश की थी।

भारत के कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार

10 अक्टूबर, 2014, शुक्रवार

कैलाश सत्यार्थी
वर्ष 2014 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से भारत और पाकिस्तान की झोली में गया। इस पुरस्कार के लिए भारत में बाल अधिकारों के लिए कार्य करने वाले कैलाश सत्यार्थी और लड़कियों की पढ़ाई के लिए संघर्ष करने वाली पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को चुना गया है। नोबेल पुरस्कार समिति ने 10 अक्टूबर, 2014 शुक्रवार को दोनों के नामों की घोषणा की। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई गणमान्य लोगों ने सत्यार्थी को पुरस्कार के लिए बधाई दी है। पुरस्कार 10 दिसंबर, 2014 को दिया जाएगा। पुरस्कार के रूप में 11 लाख डॉलर (करीब 6 करोड़ 74 लाख रुपये) दिए जाएंगे। कैलाश सत्यार्थी भारत में एक गैर सरकारी संगठन (बचपन बचाओ आंदोलन) का संचालन करते हैं। यह एनजीओ बाल श्रम और बाल तस्करी में फंसे बच्चों को मुक्त कराने की दिशा में कार्य करता है। नोबेल पुरस्कारों की ज्यूरी ने कहा, "नार्वे की नोबेल कमेटी ने बच्चों और युवाओं पर दबाव के विरुद्ध और सभी बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के लिए किए गए संघर्षों को देखते हुए कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को 2014 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का फैसला किया है।" नोबेल कमेटी ने कहा कि "बचपन बचाओ आंदोलन" नामक एनजीओ चलाने वाले सत्यार्थी ने गांधी जी की परंपरा को कायम रखा है और वित्तीय लाभ के लिए बच्चों के शोषण के ख़िलाफ़ कई शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की है। कैलाश सत्यार्थी इंटरनेशनल सेंटर ऑन चाइल्ड लेबर और यूनेस्को से जुड़े रहे हैं। शांति के नोबेल पुरस्कार के 278 दावेदार थे जिनमें पोप फ्रांसिस, बान की मून, एडवर्ड स्नोडेन, कांगो के डॉक्टर डेनिस मुक्वेग, उरुग्वे के राष्ट्रपति जोस मोजिस जैसे बड़े नाम शामिल थे।

मंगलयान सफल, भारत ने इतिहास रचा

मंगलयान द्वारा भेजी गई मंगल ग्रह की तस्वीर
24 सितम्बर, 2014, बुधवार
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी, इसरो का उपग्रह मंगलयान मंगल ग्रह की अंडाकार कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुका है। ये भारत के अंतरिक्ष शोध में एक कालजयी घटना है। इस अभियान की कामयाबी से भारत ऐसा देश बन गया है जिसने एक ही प्रयास में अपना अभियान पूरा कर लिया। भारत ने लिक्विड मोटर इंजन की तकनीक से मंगलयान को मंगल की कक्षा में स्थापित किया। आमतौर पर चांद तक पहुंचने के लिए इसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इतने लंबे मिशन पर भारत से पहले किसी ने लिक्विड मोटर इंजन का इस्तेमाल नहीं किया था। एक ओर मंगल मिशन इतिहास के पन्नों पर स्वयं को सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा रहा था वहीं दूसरी ओर यहां स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के कमांड केंद्र में अंतिम पल बेहद व्याकुलता भरे थे। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के साथ मंगल मिशन की सफलता के साक्षी बने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, "विषमताएं हमारे साथ रहीं और मंगल के 51 मिशनों में से 21 मिशन ही सफल हुए हैं, लेकिन हम सफल रहे।" खुशी से फूले नहीं समा रहे प्रधानमंत्री ने इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन की पीठ थपथपाई और अंतरिक्ष की यह अहम उपलब्धि हासिल कर इतिहास रचने के लिए भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को बधाई दी। भारत के मंगल अभियान का निर्णायक चरण 24 सितंबर को सुबह यान को धीमा करने के साथ ही शुरू हो गया था। इस मिशन की सफलता उन 24 मिनटों पर निर्भर थी, जिस दौरान यान में मौजूद इंजन को चालू किया गया। मंगलयान की गति धीमी करनी थी ताकि ये मंगल की कक्षा में गुरुत्वाकर्षण से खुद-बखुद खिंचा चला जाए और वहां स्थापित हो जाए। इस अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण 5 नवंबर, 2013 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से स्वदेश निर्मित पीएसएलवी रॉकेट से किया गया था। यह 1 दिसंबर, 2013 को पृथ्वी के गुरूत्वाकषर्ण से बाहर निकल गया था। अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान 'नासा' का मंगलयान 'मावेन' 22 सितंबर को मंगल की कक्षा में प्रविष्ट हुआ था। भारत के एम.ओ.एम. की कुल लागत मावेन की लागत का मात्र दसवां हिस्सा है। भारत ने इस मिशन पर क़रीब 450 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जो बाकी देशों के अभियानों की तुलना में सबसे ज़्यादा क़िफ़ायती है।

हाँ तो दोस्तो यह भारतीय इतिहास का एक नया अध्याय है, जिसे हम ने आपकी सेवा में प्रस्तुत किया।
पढ़ने के लिए धन्यवाद