Saturday, 9 November 2019

बाबरी मस्जिद पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले :


सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर रामलला का हक माना

कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ

अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त स्थान पर दी जाएगी जमीन

अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया है. देश की सबसे बड़ी अदालत ने सबसे बड़े फैसले में अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान का हक माना है. जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की विशेष बेंच ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया है.


09 नवंंबर 2019 को समय 10:30 बजे फैैसला सुुनाया।


शनिवार सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े, जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर पहुंचे. पांच जजों ने लिफाफे में बंद फैसले की कॉपी पर दस्तखत किए और इसके बाद जस्टिस गोगोई ने फैसला पढ़ना शुरू किया.

फैसले में ASI (भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण) का हवाला देते हुए कहा गया कि बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी खाली जगह पर नहीं किया गया था. विवादित जमीन के नीचे एक ढांचा था और यह इस्लामिक ढांचा नहीं था. कोर्ट ने कहा कि पुरातत्व विभाग की खोज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
हालांकि, कोर्ट ने ASI रिपोर्ट के आधार पर अपने फैसले में ये भी कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की भी पुख्ता जानकारी नहीं है. लेकिन इससे आगे कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष विवादित जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा है.
इस तरह 40 दिनों की लगातार सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का  फैसला आ गया है, जिसमें दशकों पुराने विवाद का अंतिम फैसला हो गया है ।

 फ़ैसले से पहले से उत्साहित बीजेपी और नरेंद्र मोदी की सरकार और ज़्यादा उत्साह में नज़र आ रही है.
ये फ़ैसला ऐसे वक्त पर आया है, जब मोदी सरकार आर्थिक सुस्ती और बढ़ती बेरोज़गारी से ध्यान हटाने के लिए हिंदुत्व की राजनीति कर रही है. इसलिए उनके लिए इस फ़ैसले का इससे बेहतर वक्त कोई और नहीं हो सकता था.

1992 मे A Historian's Report to the Nation,  सरकार को सौंपा गया था जिस रिपोर्ट को तैयार करने वालों मे से एक सदस्य प्रोफेसर डीएन झा हैं जिसका कहना है कि तब के रिपोर्ट मे बाबरी मस्जिद की खुदाई से कोई ऐसे प्रमाण नहीं मिले थे जिससे यह पता चले कि वहाँ कोई मंदिर भी रहा होगा । प्रोफेसर डीएन झा ASI की रिपोर्ट से बिलकुल भी सहमत नहीं हैं  संदिग्ध मानते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने ASI की रिपोर्ट को भी फैसले से जोड़ा है। डीएन झा मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले मे आस्था को ही प्राथमिकता दी गई है ।

Ramjanmabhoomi-Babri Masjid: A Historian's Report to the Nation' was prepared by a team of four independent historians. This report was submitted to the government.

Professor Suraj Bhan, Athar Ali, R.S. Sharma and DN In his report, Jha examined historical and archaeological evidence and rejected the belief that there was a Hindu temple under the Babri Masjid.

The author of the report and noted historian Professor DN Jha has given his reaction to the decision of the Supreme Court.

He said that the faith of Hindus has been given importance in this and the basis of the decision has been made on faulty archaeological science. Professor DN Jha called it very disappointing.

When asked what was the conclusion in his Fact Finding Report - Ramjanmabhoomi-Babri Masjid: A Historians' Report to the Nation?

DN Jha says that this report was submitted to the government before the demolition of the mosque in 1992. According to him, every evidence that was present for this report was thoroughly investigated. After which it was concluded that there was no Ram temple under the mosque.

So what else should ASI do? On this, Professor DN Jha says that ASI has always played a suspicious role in the Ayodhya dispute.

He says, "Before the demolition, when we went to the old fort to investigate the ancient things related to Ayodhya, the ASI did not give us a site notebook of Trench IV, which contained considerable evidence."

"It was clearly a case of suppressing the evidence. And after the demolition, the ASI carried out the excavation with a preconceived belief. It suppressed the evidence that cut the temple theory. Expected the ASI She goes to see the scientific norms while digging in some place. "

In such a situation, what will this decision mean for India?

To this, Professor DN Jha says, "This decision is inclined towards majoritarianism. It is not good for our country."

इस फैसले से मुसलमानों मे असंतोष और दोयम दर्जे की नागरिकता वाली समझ को बढ़ावा मिला है परंतु मुसलमानों ने देश की शांति, भाईचारा, एकता और अखंडता को बनाए रखने की कीमत पर फैसले पर उदारता दिखाई है ।
अतः बहुसंख्यक को चाहिए कि भविष्य में अल्पसंख्यकों के धार्मिक मामलों को विवादित ना बनने दे ।
अब बहुसंख्यक की यह जिम्मेवारी बनती है कि वह भविष्य मे बड़ा भाई होने के हैसियत से बड़ा दिल दिखाए ताकि हमारा देश भारत की एकता,अखंडता और भाईचारा बनी रहे तथा विकास की नई ऊंचाईयों को छू सके ।
कभी कभी हार मे ही जीत होती है
जीत कर हार जाने वाले को बाजीगर कहते हैं ।
जय हिन्द- जय भारत


Friday, 13 October 2017

पाकिस्तान के एक गांव में मुस्लिम बीफ नहीं खाते

पाकिस्तान के लोगों को कट्टरता के लिए जाना जाता है मगर बीबीसी टीम के सदस्य जब पाकिस्तान के मीठी गांव पहुंचकर वहां के हालात को देखा वह कुछ इस तरह है

पाकिस्तान के थार मरूस्थल में यह निराला शहर है. नाम है 'मीठी'.

यहां की ज़मीन सख़्त और ऊबड़ खाबड़ है लेकिन मरूस्थल और शहर का अपना सौंदर्य है.

यह शहर सिंध प्रांत के थारपारकर ज़िले का मुख्यालय है और इसकी ख़ासियत यह है कि यहां हिंदू और मुसलमान पूरे सौहार्द के साथ रहते हैं.

यहां सदियों से एक साथ रहते हुए वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि बाहर की घटनाओं से उनकी सांप्रदायिक सौहार्द न प्रभावित होने पाए.

पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची से मीठी 280 किलोमीटर दूर है.

यह पाकिस्तान की उन चुनिंदा जगहों में से है जहां हिंदुओं की संख्या मुसलमानों से ज़्यादा है.

सरकारी अनुमान के मुताबिक, मीठी की आबादी करीब 87 हज़ार है, जिसमें से 70 फ़ीसदी हिंदू हैं.

थियेटर प्रोड्यूसर हाजी मोहम्मद दाल कहते हैं, "जब भी कोई धार्मिक त्योहार या सांस्कृतिक आयोजन होता है तो सब मिल-जुलकर हिस्सा लेते हैं."

वह कहते हैं, "जब हिंदू दिवाली मनाते हैं तो हमें भी बुलाते हैं. जब हम ईद मनाते हैं तो उन्हें बुलाते हैं."

रोज़े भी रखते हैं हिंदू ।एक स्कूल में शिक्षक रहे हाजी मोहम्मद दाल कहते हैं कि दुनिया को मीठी से मोहब्बत करना सीखना चाहिए.

वह बताते हैं कि मीठी में हिंदू लोग मुहर्रम के जुलूसों में हिस्सा लेते हैं और कई बार तो मुसलमानों के साथ रोज़े भी रखते हैं.

वहीं हिंदुओं के धर्म का सम्मान करते हुए यहां के मुसलमान गाय को नहीं काटते और बीफ़ भी नहीं खाते.

दाल कहते हैं, "1971 में भारतीय सेनाएं मीठी तक पहुंच गई थीं और हमें रातोरात यहां से भागना पड़ा था."

उनके मुताबिक, "हमारे साथ रहने वाले सारे हिंदू इस बात से बहुत नाराज़ थे और उन्होंने हमें यहां वापस आकर रहने के लिए मनाया."

हिंदू महिला ने दान दी मस्जिद के लिए ज़मीन

2001 में मीठी के जामा मस्जिद परिसर को पड़ोस की ज़मीन लेकर और बढ़ाने की योजना थी.

दाल बताते हैं, "उस घर में एक हिंदू महिला रहती थी. वह अपने आप मेरे पास आई और कहा कि उसकी ज़मीन मस्जिद के लिए ले ली जाए."

दाल कहते हैं कि उसने अपनी ख़ुशी से अपनी ज़मीन मस्जिद के लिए दान में दे दी.

विशन थारी, जिन्हें सब 'मामा विशन' कहते हैं- थारपारकर में ब्लड डोनर्स का एक नेटवर्क चलाते हैं.

वह कहते हैं, "मुसलमान मेरी बहुत इज़्ज़त करते हैं और हमेशा बिना किसी भेदभाव के ख़ून देने को तैयार रहते हैं."

विशन 2015 का वो समय याद करते हैं जब सिंधी गायक सादिक़ फक़ीर का निधन हुआ था.

वह बताते हैं, "उस दिन होली थी, लेकिन किसी ने रंग नहीं खेला, जश्न नहीं मनाया. ऐसा लगा कि पूरा शहर शोक मना रहा हो."

अनूठी मिसालI

मीठी के एक निजी स्कूल की प्राध्यापिका कमला पूनम हैदराबाद से आकर पाकिस्तान में बसी हैं.

वह कहती हैं, "लोग शुरू से यहां प्यार-मुहब्बत से रह रहे हैं. बुज़ुर्गों ने शांति की परंपरा को ज़िंदा रखा है. कभी कोई नौजवान हदें पार करता है तो उसे दोनों मजहबों के बड़े-बूढ़े ठीक कर देते हैं."

एक संघर्ष के शिकार इलाक़े में मीठी शहर मजहबी एकता की अनूठी मिसाल बना हुआ है.

हाजी मोहम्मद दाल कहते हैं, "औरों को मीठी से मोहब्बत का पाठ सीखना चाहिए."

Tuesday, 19 April 2016

भारत की बेटी दीपा करमाकर ने रचा इतिहास

भारत की बेटी दीपा करमाकर ने जिमनास्ट मे नया इतिहास रचकर दुनिया के सामने भारत का सिर उँचा रखने की कड़ी मे अपना अद्भुत योगदान दिया है 


 दीपा करमाकर ने सोमवार को इतिहास रच दिया, वह ओलंपिक के लिये क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट बन गयीं। दीपा ने यहां अंतिम क्वालीफाइंग और परीक्षण टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन कर रियो ओलंपिक का टिकट कटाया। 22 वर्षीय जिमनास्ट ने कुल 52.698 अंक बनाकर अगस्त में होने वाले ओलंपिक की कलात्मक (आर्टिस्टिक) जिमनास्टिक्स में जगह बनायी। पहली भारतीय महिला के अलावा वह 52 साल लंबे अंतराल बाद खेलों के महासमर के लिये क्वालीफाइंग करने वाली पहली भारतीय जिमनास्ट भी हैं

ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्‍व करने जा रही दीपा ने अपना दर्द बयां किया. उन्‍होंने बीबीसी से बात करते हुए एक बार कहा था कि एक बार उनके पास पहनने के लिए जूते नहीं थे और उन्‍होंने किसी दूसरे से जूते उधार में लिये और ढीले-ढाले कपड़ों से ही जिमनास्‍ट स्‍पर्धा में हिस्‍सा लिया था.
 
   दीपा करमाकर राष्‍ट्रीय,अंतरराष्‍ट्रीय स्‍पर्धाओं में कूल 77 मेडल जीत चुकी हैं. जिसमें 67 गोल्‍ड मेडल शामिल हैं.

52 सालों के बाद ओलंपिक के लिए क्‍वालिफाई करके देश का मान बढ़ाने वाली देश की पहली भारतीय महिला         जिमनास्ट दीपा करमाकर का सफर काफी कांटों भरा रहा   है.कभी सपाट पैर के कारण उन्‍हें इस खेल का हिस्‍सा नहीं     बनाया जा रहा था, लेकिन दीपा ने अपने दृढ संकल्प से आज इस खेल का हिस्‍सा भर नहीं हैं, बल्कि 52 सालों में ओलंपिक के लिए क्‍वालिफाई करके उन्‍होंने देश का मान बढ़ाया है.

 9 अगस्‍त 1993 को अगरतला के त्रिपुरा में जन्‍मीं दीपा         करमाकर महज 6 साल की उम्र से ही जिमनास्‍ट कर रही हैं 



ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय जिम्नास्ट बनकर इतिहास रचने के कुछ घंटों के बाद दीपा करमाकर ने  रियो ओलंपिक खेलों की परीक्षण प्रतियोगिता में वाल्ट्स फाइनल में स्वर्ण पदक जीता.
भारत की बेटियों ने समय समय पर अपने कुशल कौशल से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है चाहे एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज हो या सानिया मिर्जा या फिर सायना नेहवाल इत्यादि 
अंजू बॉबी जॉर्ज ने 2005 के मोनाक वर्ल्ड एथलेटिक्स के फाइनल में सिल्वर मेडल जीता था, लेकिन अब भारत की ओर से वर्ल्ड एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल जीतनेवाली पहली भारतीय महिला एथलीट बन गयी  

बेटी कहीं से भी बेटों से पीछे नहीं है बस माता पिता के इमांदारी भरा ध्यान की आवश्यकता है , बेटे का तरह बेटी पर ध्यान दिया जाए तो वह बेटों से काफी आगे निकल जाए ,  दीपा करमकार समय समय पर बेटियों को प्रेरणा स्रोत के तौर पर जन्म लेती है ताकि यह फिर से साबित हो सके कि बेटी कहीं से भी बेटे से पीछे नहीं 

भारत की बेटी ने रचा इतिहास

भारत की बेटी दीपा करमाकर ने जिमनास्ट मे नया इतिहास रचकर दुनिया के सामने भारत का सिर उँचा रखने की कड़ी मे अपना अद्भुत योगदान दिया है 


 दीपा करमाकर ने सोमवार को इतिहास रच दिया, वह ओलंपिक के लिये क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट बन गयीं। दीपा ने यहां अंतिम क्वालीफाइंग और परीक्षण टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन कर रियो ओलंपिक का टिकट कटाया। 22 वर्षीय जिमनास्ट ने कुल 52.698 अंक बनाकर अगस्त में होने वाले ओलंपिक की कलात्मक (आर्टिस्टिक) जिमनास्टिक्स में जगह बनायी। पहली भारतीय महिला के अलावा वह 52 साल लंबे अंतराल बाद खेलों के महासमर के लिये क्वालीफाइंग करने वाली पहली भारतीय जिमनास्ट भी हैं

ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्‍व करने जा रही दीपा ने अपना दर्द बयां किया. उन्‍होंने बीबीसी से बात करते हुए एक बार कहा था कि एक बार उनके पास पहनने के लिए जूते नहीं थे और उन्‍होंने किसी दूसरे से जूते उधार में लिये और ढीले-ढाले कपड़ों से ही जिमनास्‍ट स्‍पर्धा में हिस्‍सा लिया था.
 
   दीपा करमाकर राष्‍ट्रीय,अंतरराष्‍ट्रीय स्‍पर्धाओं में कूल 77 मेडल जीत चुकी हैं. जिसमें 67 गोल्‍ड मेडल शामिल हैं.

52 सालों के बाद ओलंपिक के लिए क्‍वालिफाई करके देश का मान बढ़ाने वाली देश की पहली भारतीय महिला         जिमनास्ट दीपा करमाकर का सफर काफी कांटों भरा रहा   है.कभी सपाट पैर के कारण उन्‍हें इस खेल का हिस्‍सा नहीं     बनाया जा रहा था, लेकिन दीपा ने अपने दृढ संकल्प से आज इस खेल का हिस्‍सा भर नहीं हैं, बल्कि 52 सालों में ओलंपिक के लिए क्‍वालिफाई करके उन्‍होंने देश का मान बढ़ाया है.

 9 अगस्‍त 1993 को अगरतला के त्रिपुरा में जन्‍मीं दीपा         करमाकर महज 6 साल की उम्र से ही जिमनास्‍ट कर रही हैं 



ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय जिम्नास्ट बनकर इतिहास रचने के कुछ घंटों के बाद दीपा करमाकर ने  रियो ओलंपिक खेलों की परीक्षण प्रतियोगिता में वाल्ट्स फाइनल में स्वर्ण पदक जीता.

 

Monday, 18 April 2016

चंदा कोचर कुशल प्रबंधन, मेहनत और अनुशासन के बल पर कामयाबी के शिखर तक पहुँची साथ ही एक माँ के रूप मे मदर इंडिया का रीयल रॉल को भी निभाती रही |

चंदा कोचर न केवल एक अच्छी कुशल प्रबंधक है बल्कि बच्चों के लिए एक अच्छी माँ भी

                  आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर का नाम आज शक्तिशाली महिलाओं की सूची में शामिल हैं। मैनेजमेंट ट्रेनी की छोटी सी पोस्ट से बैंक के उच्चतम पद तक पहुंचने वाली चंदा की सफलता महिला सशक्तिकरण का एक आदर्श उदाहरण है।

                  आज चंदा कई महिलाओं की प्रेरणा हैं। उनके जज्बे और मेहनत से उन्हें आगे बढ़ने की सीख मिलती है। चंदा कोचर भले ही आज ऊंची पोस्ट पर हो लेकिन घर में वे एक मां ही हैं और जिन्होंने अपने काम और परिवार के बीच एक संतुलन बनाकर रखा हुआ है। बेटी के सवाल पर कि कैसे वे दोनों कार्यक्षेत्रों को बाखूबी निभा लेती हैं पर चंदा कोचर ने अपनी बेटी के नाम एक खत लिखा है जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के अनुभवों को शेयर किया कि किस तरह अपने माता-पिता के बनाए अनुशासन पर ही उन्होंने अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाया है।

                             चंदा कोचर का यह पत्र सुधा मेनन द्वारा संकलित किताब अपनी बेटियों के लिए प्रख्यात माता-पिता से विरासत पत्र में छपा है। इसमें चंदा कोचर ने अपनी बेटी आरती को संबोधित करते हुए लिखा है कि प्रिय आरती आज मुझे तुम्हें अपने से आगे जाते देख बहुत गर्व महसूस हो रहा है। तुम दिन पर दिन आगे बढ़ती जा रही हो। तुम्हारी कामयाबी ने मुझे अपने दिन याद दिला दिए। जीवन के जिस दौर से तुम गुजर रही हो उसी दौर में मैने भी बहुत कुछ सीखा है। मुझे पता है बच्चे अपने माता-पिता को देख कर ही सीखते हैं और मुझे गर्व है कि जो मैंने अपने परिवार से पाया वो सब काबिलियत तुम में भी है। तुम्हारे नाना-नामी ने हम दोनों बहनों और भाई को एक जैसी परवरिश और संस्कार दिए हैं। एक जैसी सोच के साथ हमारा पालन हुआ है। मैं बस 13 साल की थी जब तुम्हारे नाना की मौत हो गई थी और उनके बिना हम जीने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। तब हमारे सामने घर चलाने की सबसे बड़ी चुनौती थी और तुम्हारी नानी ने हम तीनों को संभाला और हिम्मत से हमारा पालन-पोषण किया क्योंकि सारी जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई थी। तुम्हारी नानी ने सारी जिम्मेदारियां बाखूबी निभाई और आज उन्हीं की बदौलत हम आज ये मुकाम हासिल कर पाए। माता-पिता की सबसे बड़ी ड्यूटी अपने बच्चों की देखभाल होती है जो कि फुल टाइम जॉब की तरह है। मुझे वो दिन याद है जब तुम यू.एस में पढ़ रही थी और मुझे आईसीआईसीआई बैंक का सीईओ बनाया गया था कुछ दिनों बाद तुम्हारा मेल आया जिसमें तुमने लिखा था कि आपने हमें कभी महसूस नहीं होने दिया कि आप एक सफल महिला हो और कैसे एक तनावपूर्ष करियर के बाद भी हमें संभाला। घर पर आप सिर्फ और सिर्फ एक मां थीं। चंदा कोचर ने खत के आखिर में लिखा-आरती जिंदगी में कुछ हासिल करने की इच्छा दिल और दिमाग में हमेशा रहनी चाहिए लेकिन इन सबके बीच एक बात जरूरी है कि आप जो भी कर रहे हो उसके लिए ईमानदार रहो। कभी अपने सपनों को खत्म मत होने दो बल्कि उनको पूरा करो। वहीं अपने ईर्द-गिर्द को लोगों की भावनाओं का ध्यान भी जरूर रखना चाहिए। एक आखिरी बात कि जब तुम तनाव में हो तो और ये आफको आगे नहीं बढ़ने दे रहा तो यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है क्योंकि अच्छे और बुरे दोनों दिन आपके जिंदगी का हिस्सा होते हैं, उसे एक बराबर रखो। 

Saturday, 16 April 2016

नीतीश कुमार ने नशामुक्त राष्ट्र बनाने की पहल बिहार की भूमि से शूरू किया

नीतीश कुमार ने शराब बंदी कानून के द्वारा नशामुक्ति का जो अभियान चलाया है उसका असर बिहार मे साफ दिखाई दे रहा है|
शाम होते ही जहां मार्केट में शराब पीकर मदमस्त नौजवान हमारी मां बहनों को गुर्राते आँखों से घूरते थे , शाम होते ही महिलाओं को इंसान की सूरत मे भेड़िया नजर आता था ,लड़किया बाजार से लौटते हुए बदहवासी मे चलती , अब शराब बंदी ने इन सब कारणों को ध्वस्त कर दिया है |
अब हमारी माँ बहनों को मद मस्त आँखों की गुर्राहट का सामना नहीं होगा| अब हमारी माँ बहनों को कोई शराब के नशे मे परेशान नहीं कर पाएगा| अब शाम होते ही मार्केट मे शराब पीने वालों का जमावड़ा नहीं होगा, अपराधिक छवि के लोग शराब के बहाने एक जगह जमा नहीं हो पाएंगे असमाजिक तत्व जो नशे का सहारा लिए बिना अपराध नहीं कर पाता था ऐसे अपराध में भारी कमी आएगी|

दूसरे राज्यों की आेर भी जाने लगी है शराबबंदी की भावना

सीएम नीतीश ने कहा कि शराबबंदी की भावना बिहार की सीमा से निकल कर दूसरे राज्यों की ओर जाने लगी है. झारखंड और यूपी के बाद तमिलनाडु और महाराष्ट्र से भी आवाजें उठने लगी हैं. मुख्यमंत्री ने  कहा कि  झारखंड और यूपी की महिलाओं के समूह ने हमको आमंत्रण दिया है कि हमारे यहां शराबबंदी लागू करवाएं. तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने वाला है. वहां डीएमके नेता करुणानिधि के साथ-साथ  एआइडीएमके नेता जयललिता भी घोषणा कर चुकी हैं कि यदि उनकी सरकार बनी तो उनके यहां भी पूर्ण शराबबंदी लागू होगी. 

 
महाराष्ट्र के वर्धा से महिलाओं का अाया संवाद

मुख्यमंत्री ने कहा कि महाराष्ट्र के वर्धा से महिलाओं का संवाद आया है. वहां की महिलाएं शराबबंदी के लिए बिहार आकर बधाई देना चाहती हैं. मुख्यमंत्री ने कहा कि गरीब आदमी गाढ़ी कमाई का पैसा शराब में बहा देता था. शराब पीकर लोग झगड़ा करते थे. घरेलू हिंसा की  शिकार महिलाएं होती थीं. हमलोगों ने शराबबंदी का माहौल बनाया, आप लोगों ने  उसे अपार समर्थन देकर सफल बनाया.  

 
बिहार को फिर से बनाना है गौरवशाली 
एक करोड़ 19 लाख लोगों ने न शराब पियेंगे और न पीने देंगे पर हस्ताक्षर कर शपथ पत्र जमा किया है.  नौ लाख जगहों पर नारे लिखे गये. उन्होंने कहा कि पुलिस  एवं उत्पाद विभाग के अधिकारी अपना काम करते रहेंगे. सबसे जबरदस्त काम महिलाओं और बच्चों ने शराबबंदी के लिए माहौल बना कर किया. मुख्यमंत्री ने कहा  कि बिहार को फिर से गौरवशाली बनाना है, इसे गौरव के शीर्ष पर पहुंचाना है. 

इस्लाम धर्म मे शराब पीना पूरी तरह मना है, 

 महात्मा गांधी शराब के सेवन को एक प्रमुख सामाजिक बुराई मानते थे। उन्होंने भारत में इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की वकालत की। इसको ध्यान में रखते हुए भारत के संविधान निर्माताओं ने देश को चलाने के निर्देशक नियमों में धारा 47 को शामिल किया, जिसमें कहा गया है कि चिकित्सा उद्देश्य के अतिरिक्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेयों तथा ड्रग्ज पर सरकार प्रतिबंध लगा सकती है।


गांधी जी की इच्छा को देखते हुए विभिन्न राज्यों, जिनमें तत्कालीन मद्रास प्रोविंस तथा बॉम्बे स्टेट व कई अन्य राज्य शामिल थे, ने शराब के खिलाफ कानून पारित कर दिया। 1954 में भारत की एक चौथाई आबादी इस नीति के अंतर्गत आ गई। गांधी जी के अलावा मोरार जी देसाई बिल्कुल शराब नहीं पीते थे जिन्होंने इस नीति को और बढ़ावा दिया। सही कहा गया है कि किसी कार्य की प्रभावहीनता का एहसास किए बिना हम सभी गलतियां करना पसन्द करते हैं।

बिहार मे शराब बंदी को लेकर नीतीश कुमार ने विपरित हालात मे साहस भरा कदम उठाकर न्याय के साथ विकास के रास्ते को चौड़ा कर दिया है|

शराब का धंधा अनैतिक
मुख्यमंत्री  ने कहा कि शराबबंदी के बाद बिहार सरकार को सालाना चार हजार करोड़ रुपये का राजस्व नहीं मिलेगा, इसकी मुझे परवाह नहीं है. मुझे लगता था कि यह धंधा अनैतिक है.  


 

बिहार मे शराब बंदी कानून लागू कर दिया गया


बिहार में शराबबंदी के बाद अब घर के कामकाज में पति अपनी पत्नी का सहयोग कर रहे हैं। राज्य में पूर्ण शराबबंदी को अमलीजामा पहनाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक कार्यक्रम में बताया कि बेरोजगारी के दिनों में उनके एक बहनोई ( जीजाजी ) को भी शराब की लत थी जिससे परिवार में सब लोग दुखी रहते थे।

डॉक्टर भीमराव आंबेडकर जयंती पर पटना में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए नीतीश ने साफ कर दिया कि राज्य में शराबबंदी पर पुनर्विचार का सवाल ही नहीं उठता। इसके साथ ही उन्होंने ऐलान किया कि शराब के किसी भी तरह के विक्रेता, चाहे वे थोक विक्रेता हों या खुदरा विक्रेता, के घाटे की भरपाई राज्य सरकार करेगी। सीएम ने साफ किया कि सरकार आर्थिक घाटे की चिंता न करते हुए इस पाबंदी से समाज पर पड़ने वाले सकारात्‍मक असर को लेकर बेहद उत्साहित है।  

नीतीश ने दावा किया कि जब से राज्य में देसी और विदेशी शराब पर पाबंदी लगी है, गांवों और शहरों में न केवल झगड़ों में कमी आई है बल्कि अपराधिक घटनाओं में भी पुलिस विभाग ने कमी दर्ज की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार के कारण ही तमिलनाडु में दोनों प्रमुख दलों को अपने घोषणापत्र में वादा करना पड़ा कि सरकार बनने के बाद वे भी मद्य निषेध की दिशा में कदम उठाएंगे। पड़ोसी राज्य झारखंड से बिहार में शराब की तस्करी की खबरों पर नीतीश ने कहा कि जल्द ही वे झारखंड का दौरा कर वहां की महिलाओं को शराबबंदी के बारे में जागरुक करेंगे और वहां की सरकार पर दबाब बनाने के लिए आंदोलन छेड़ने का आह्वान करेंगे।
 
पूर्ण शराबबंदी के किसी भी राज्य में सफल नहीं होने संबंधी आलोचकों की दलील पर नीतीश ने साफ कहा कि अगर आज से पहले यह कदम सफल नहीं हुआ तो राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे तो बैठी नहीं रहेगी। एवरेस्ट की सफल चढ़ाई के पहले भी कई बार असफल प्रयास हुए, लेकिन एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नॉर्गे घर पर नहीं बैठे रहे बल्कि उन्होंने प्रयास किया और सफल रहे।

सीएम ने कहा कि उन्‍हें मालूम हैं कि शराब के व्‍यापार से होने वाले लाभ के कारण एक तबका इसे विफल करने का प्रयास करेगा लेकिन मेरी सरकार इस कोशिश को विफल कर देगी। हालांकि बिहार में शराबबंदी के नीतीश सरकार के  फैसले पर पटना हाईकोर्ट में एक मामला लंबित है जिस पर इस महीने की 19 तारीख को फिर से सुनवाई होगी। कोर्ट ने अपनी पिछली सुनवाई में राज्य सरकार को निर्देश दिया हैं कि जिस स्टॉकिस्ट, होटल या बार वालों के पास शराब का स्‍टॉक है, उन पर शराब नष्‍ट करने के लिए फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए।जाए।


बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार 

 बिहार देश का चौथा ऐसा राज्य है जहां शराबबंदी को पूरी तरह लागू कर दिया गया है. ये नीतीश कुमार के चुनावी वादों में सबसे प्रमुख था. इसी महीने की 5 तारीख को नीतीश कुमार ने इसे पूरे राज्य में लागू कर दिया. नीतीश कुमार का ये ऐसा दांव है जिसका विरोध करना विपक्ष के लिए भी आसान नहीं है. लेकिन बिहार सरकार के इस फैसले की जमीनी हकीकत क्या है, शऱाबबंदी ने किस तरह से लोगों की जिंदगी पर असर डाला है.

गुजरात, नागालैंड और मणिपुर के बाद बिहार देश का चौथा ऐसा राज्य बन गया हैं जहां शराब पर पूरी पाबंदी लागू हो गई है. ये वही राज्य है जहां अवैध शराब ने न जाने कितने लोगों की जान लीं, कितने परिवार तबाह हो गए लेकिन क्या राज्य सरकार का ये फैसला बिहार में एक नए सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद बनेगा. सरकार की नेक नीयति से हम यह कह सकते हैं कि बिहार मे शराब बंदी कानून शत प्रतिशत सफल होगी|


Tuesday, 8 December 2015

अजीत डोभाल और संघ परिवार के रिश्ते

यह अजीत डोभाल किसके लिए काम कर किया या कर रहा है?

देश के भीतर और बाहर मौजूद खतरे से आगाह करने की जिम्मेदारी भारत के NSA अजीत डोभाल के ही कंधों पर है। आईबी के पूर्व डायरेक्टर की हैसियत से वह देश की सुरक्षा से जुड़े कई अहम मिशनों से जुड़े रहे हैं। आईबी से रिटायर होने के बाद वह विवेकानंद फाउंडेशन के डायरेक्टर बने और रामदेव, अन्ना, मोदी समेत कई लोगों के लिए कूटनीति तैयार की।

अजीत डोभाल और विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़ी कुछ खास बातें।   


 

यह फाउंडेशन बना कै कैसे?  
यह फाउंडेशन कन्याकुमारी में स्थित विवेकानंद केंद्र का हिस्सा है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के एकनाथ रानाडे ने की थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी विचारधारा पर बना थिंक टैंक विवेकानंद फाउंडेशन आज कल मोदी सरकार के लिए पड़ोसी देशों से संबंध और रणनीतिक मामलों पर इनपुट देने का काम करता है। जिसमें भारत के कई रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस, साइंटिस्ट और सैन्य अफसर शामिल हैं। अजीत डोभाल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) बनने के बाद उनकी जगह एन.सी. विज को फाउंडेशन का डायरेक्टर बनाया गया। फाउंडेशन से जुड़े पूर्व ब्यूरोक्रेट और सेना के पूर्व अधिकारियों के अलावा ज्यादातर लोग श्रमदान के रूप में काम करते हैं। कोई तनख्वाह नहीं लेते

बाबा रामदेव औैर अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान परदे के पीछे की रणनीति और इंटलेक्चुअल इनपुट देने का काम इसी फाउंडेशन ने किया है। रामदेव विवेकानंद फाउंडेशन से लगातार संपर्क में रहते हैं। हालांकि, खुद अजीत डोभाल फाउंडेशन के आंदोलनों में किसी तरह की भूमिका से इंकार करते रहे हैं। दूसरी ओर बाबा रामदेव कहते हैं हम सभी संगठनों से कालाधन वापस लाने में मदद मांग रहे थे। तब फाउंडेशन ने हमारी काफी मदद की। दक्षिणपंथी विचारधारा और संघ के करीब होने के सवाल पर फाउंडेशन के एडिटर केजी सुरेश कहते हैं, अगर राष्ट्रवादी होना राइटविंग या दक्षिणपंथ है, तो हम हैं। लेकिन हमारे यहां सभी दलों के लोग मदद के लिए आते हैं।
विवेकानंद फाउंडेशन यूपीए सरकार की नाक में दम भरने वाली गतिविधियों का केंद्र भी रहा था। परदे के पीछे की तमाम योजनाएं इसी केंद्र में बनीं। जब यूपीए सरकार इशरत जहां एनकाउंटर मामले में नरेंद्र मोदी की घेराबंदी कर रही थे उस वक्त अजीत डोभाल इशरत जहां केस में मोदी के सबसे बड़े पैरोकार बने थे। लालकृष्ण आडवाणी, गोविंदाचार्य, गुरुमूर्ति से लेकर संघ और बीजेपी से जुड़े तमाम सीनियर नेता और विचारक फाउंडेशन के विमर्श कार्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं। हालांकि फाउंडेशन के लोग आरएसएस के सीधे जुड़ाव से इनकार करते हैं, लेकिन इसके कार्यक्रमों में स्वयंसेवकों की बड़ी भूमिका साफ तौर पर देखी जाती रही है।


विवेकानंद फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में एक से बढ़कर एक दिग्गज हैं। बोर्ड में पूर्व सेना प्रमुख वीएन शर्मा, रॉ के पूर्व प्रमुख एके वर्मा, पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस कृष्णास्वामी, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, थिंकर एस गुरुमूर्ति, भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलुरु के प्रोफेसर आर वैद्यनाथ, पूर्व सेना प्रमुख शंकर रॉय, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार, जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एस. के. सिन्हा, पूर्व बीएसएफ प्रमुख प्रकाश सिंह, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, इसरो के पूर्व महानिदेशक वीके सारस्वत, पूर्व सीबाआई प्रमुख सीडी सहाय, रूस में भारत के राजदूत रहे प्रभात शुक्ला समेत कई पूर्व अफसर शामिल हैं।

 

दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित विवेकानंद फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक फंडिंग का बड़ा स्रोत डोनेशन है। देश-विदेश से लोग इस संस्थान को डोनेशन देते हैं। वर्ष 2013 में फाउंडेशन को एक करोड़ 49 लाख 56 हजार रुपए डोनेशन के तौर पर मिले थे। 2 लाख रुपए की ग्रांट विदेश मंत्रालय से मिली। इसी साल मानदेय, सैलरी, फीस और स्टाइपेंड पर 93 लाख 36 हजार रूपए से ज्यादा की राशि खर्च हो गई।















अजीत डोभाल लंबे समय से आरएसएस और संघ परिवार से जुड़े रहे हैं और संघ की रणनीति को सफल बनाने मे अजीत डोभाल के योगदान को भला कौन नहीं जानता, अगर २००९ मे भाजपा की सरकार बन जाती तो अजीत डोभाल को यह पद उसी समय मिल जाता, अन्ना हजारे को गाँधीवादी के तौर पर प्रमोट करना यह सब अजीत डोभाल की ही रणनीति का सफल हिस्सा रहा है, अटल सरकार के समय जब भारतीय विमान को तालिबान द्वारा हाइजैक कर लिया गया था और विमान मे लगभग ढेढ सौ से अधिक यात्री भारतीय थे जिसे कंधार से सुरक्षित लाने की जिम्मेदारी अटल सरकार के उपर थी, तालिबान का शर्त था कि वह भारत के जेलों मे बंद पाकिस्तानी कैदियों को सुरक्षित रिहा करे, उस समय अजीत डोभाल ही ने तालिबान से सिलसिलेवार  वार्ता किया और तालिबान के संपर्क मे बने रहने के बाद पाकिस्तानी कैदियों को  रिहा किया और भारतीय यात्रियों को सुरक्षित स्वदेश लाया गया था, तब यह राज खुलकर लोगों के बीच आ गया कि अजीत डोभाल से पाकिस्तानी आतंकवादियों से क्या रिश्ता था, अजीत डोभाल कैसे इतने घुले मिले रहे? यह किस के लिए काम कर रहे थे,?