क्या राजनीतिक दलों का इस तरह का मेल-मिलाप केवल चुनावी लाभ के लिए ही होता है?
अभी कल तक रामविलास पासवान और उनके साथी न केवल भाजपा को सांप्रदायिक बताते थे, बल्कि उसे भारत जलाओ पार्टी की संज्ञा भी देते थे। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के तो वह कटु आलोचक थे और खुद को पंथनिरपेक्ष साबित करने के लिए यह भी रेखांकित करते थे कि वह गुजरात दंगों के कारण ही राजग से अलग हुए थे।
हालांकि अब उनके पास यह एक मजबूत तर्क है कि मोदी को गुजरात दंगों के मामले में अदालत से क्लीनचिट मिल गई है, लेकिन शायद ही उन्होंने कभी अदालत के फैसले का इंतजार करने की बात कही हो। दरअसल हमारे राजनेता अपनी सुविधा के लिए कोई न कोई आड़ खोज ही लेते हैं। उनकी इसी प्रवृत्तिके चलते गठबंधन राजनीति अवसरवाद का पर्याय बन गई है। यह सही है कि लोजपा के फिर से भाजपा के साथ जुड़ने से नरेंद्र मोदी को अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में मदद मिलेगी, लेकिन यह सवाल तो उठेगा ही कि क्या भाजपा को बिहार में सचमुच में लोजपा सरीखे दल के सहारे की जरूरत थी?
भले ही अब भाजपा यह दावा करे कि उसने बिहार में एक सहयोगी तलाश लिया है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि रामविलास पासवान कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं हैं। लोजपा राजनीतिक रूप से एक डूबती हुई नैया बनी हुई थी। यही कारण है कि पहले पासवान ने राजद और कांग्रेस से जुड़ने की कोशिश की और जब उन्हें वहां अपेक्षित महत्व नहीं मिला तो वह भाजपा के साथ आ खड़े हुए। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि भाजपा बिहार में अपने लोगों के उन स्वरों की अनसुनी कर रही है जो इस मेल-मिलाप के खिलाफ हैं। उसके तमाम पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ नेताओं को यह मेल-मिलाप रास नहीं आ रहा है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि भाजपा की ओर से जोर-शोर से यह दावा किया जा रहा था कि वह बिहार में अपने दम पर एक बड़ी ताकत के रूप में उभरने जा रही है। अब भाजपा नेताओं को अपने लोगों को समझाना पड़ेगा कि उसे लोजपा की जरूरत थी।
बचपन मे मुझे मेरे शिक्षक ने बताया कि लिखने से याद्दाश्त मजबूत होती है तब से लेखन का सिलसिला जारी है
Thursday, 27 February 2014
रामविलास पासवान के भाजपा से गठबंधन केवल पासवान के हित में है ना कि जनता के ?
Wednesday, 26 February 2014
हमें भूलना नहीं चाहिए कि राजीव गांधी की हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का नतीजा थी। इसे लिट्टे नेता प्रभाकरण और उनके बीच की निजी लड़ाई मानकर कमतर आंकना भूल होगी। कुछ तमिल नेता निजी स्वार्थ में ऐसा करते आए हैं। राजीव गांधी की हत्या को 23 साल होने को आए। इस दौरान हम उनके हत्यारों को सजा दिलाने की बजाय बेबस भाव से सियासी दांव-पेच देखते आए हैं। गुजरे हफ्ते का घटनाक्रम तो और अधिक चौंकाता है, देश की आला अदालत उनकी सजा-ए-मौत को उम्र कैद में तब्दील करती है और अगले ही दिन तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता उनकी रिहाई की घोषणा कर देती हैं। हकबकाई केंद्र सरकार उसके अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाकर रिहाई पर रोक का आदेश हासिल करती है। यह सब क्यों? क्या एक पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारे टहलते हुए घर चले जाने की आजादी पा सकते हैं? अगर हम संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं, तो कुछ गुण-धर्मों का भी पालन करना होगा। राजीव गांधी किसी राजनीतिक परिवार या पार्टी के मुखिया भर नहीं थे। वह पांच साल तक इस देश के प्रधानमंत्री रहे। जो मुल्क अपने सर्वोच्च राजनेता के हत्यारों को सजा नहीं दे सकता, वह आम आदमी की सुरक्षा की गारंटी कैसे ले सकता है? हमें भूलना नहीं चाहिए कि राजीव गांधी की हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का नतीजा थी।
हमें भूलना नहीं चाहिए कि राजीव गांधी की हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का नतीजा थी। इसे लिट्टे नेता प्रभाकरण और उनके बीच की निजी लड़ाई मानकर कमतर आंकना भूल होगी। कुछ तमिल नेता निजी स्वार्थ में ऐसा करते आए हैं।
राजीव गांधी की हत्या को 23 साल होने को आए। इस दौरान हम उनके हत्यारों को सजा दिलाने की बजाय बेबस भाव से सियासी दांव-पेच देखते आए हैं। गुजरे हफ्ते का घटनाक्रम तो और अधिक चौंकाता है, देश की आला अदालत उनकी सजा-ए-मौत को उम्र कैद में तब्दील करती है और अगले ही दिन तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता उनकी रिहाई की घोषणा कर देती हैं। हकबकाई केंद्र सरकार उसके अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाकर रिहाई पर रोक का आदेश हासिल करती है। यह सब क्यों? क्या एक पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारे टहलते हुए घर चले जाने की आजादी पा सकते हैं? अगर हम संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं, तो कुछ गुण-धर्मों का भी पालन करना होगा।
राजीव गांधी किसी राजनीतिक परिवार या पार्टी के मुखिया भर नहीं थे। वह पांच साल तक इस देश के प्रधानमंत्री रहे। जो मुल्क अपने सर्वोच्च राजनेता के हत्यारों को सजा नहीं दे सकता, वह आम आदमी की सुरक्षा की गारंटी कैसे ले सकता है? हमें भूलना नहीं चाहिए कि राजीव गांधी की हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का नतीजा थी। इसे लिट्टे नेता प्रभाकरण और उनके बीच की निजी लड़ाई मानकर कमतर आंकना भूल होगी। कुछ तमिल नेता निजी स्वार्थ में ऐसा करते आए हैं।भारत ने जब श्रीलंका में शांति सेना भेजने का फैसला किया था, उस समय दो चर्चाएं जोरों पर थीं। पहली यह कि लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन ने ‘तमिल ईलम’ के सपने में भारतीय भूभाग भी शामिल कर रखे हैं। दूसरी, रोजमर्रा के खून-खराबे से तंग आकर श्रीलंका ने नई दिल्ली से मदद की गुहार लगाई और यह संकेत भी दिया कि अगर भारत मदद नहीं करेगा, तो हम पाकिस्तान अथवा चीन के दरवाजे खटखटाएंगे। भला कौन भारतीय प्रधानमंत्री चीन अथवा पाकिस्तान की फौजों को श्रीलंका में दाखिल होने की अनुमति देगा? लंबे समय से इन दोनों देशों से लगी सीमाएं सुलगती रही हैं। अगर इनकी श्रीलंका से सामरिक संधि हो जाती, तो हिन्दुस्तान सैंडविच बनकर रह जाता। जाहिर है, नौजवान प्रधानमंत्री के पास बहुत कम विकल्प थे।
आप याद कर सकते हैं, राजीव गांधी ने बेहद कठिन समय में सत्ता संभाली थी। उनकी मां इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री आवास में ही उनके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी। इस खौफनाक हत्याकांड का ताना-बाना सीमा पार बैठे सैन्य विशेषज्ञों ने बुना था। 31 अक्तूबर, 1984 का वह सवेरा इस देश के सामने सीधी चेतावनी लेकर उपस्थित हुआ था। हमारी प्रभुसत्ता खतरे में थी। साफ हो गया था कि सरहद पार से आने वाली इमदाद के सहारे कुछ भटके हुए लोग अपने इरादों के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। उधर, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भी दहशतगर्दों के प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ था। राजीव को इस तीर्थस्थल की पवित्रता की रक्षा के लिए तमाम कूटनीतिक, राजनीतिक और रणनीतिक मशक्कत करनी पड़ी। ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ को आज कोई याद नहीं करता, पर इसी कार्रवाई ने पंजाब में आतंकवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोकी थी।
राजीव गांधी को उत्तर-पूर्व में परंपरागत तौर पर चले आ रहे अलगाववाद से भी निपटना पड़ा। इसके लिए उन्होंने ललडेंगा से समझौता किया और तमाम ऐसे कदम उठाए, जिनकी वजह से आज सतबहनी के राज्यों में अमन है। उनकी अगली परेशानी तमिलनाडु में पनप रही आतंकवादी गतिविधियां थीं। यह सच है कि उनके द्वारा लिए गए फैसलों की वजह से देश के एक बड़े भूभाग में शांति और व्यवस्था कायम हो सकी। इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
क्या ऐसे शख्स की शहादत निर्थक जानी चाहिए? यह व्यवस्थागत दोष है कि भारत आतंकवाद के मामलों में अपेक्षित तेजी और सख्ती नहीं बरत पाता।
Tuesday, 25 February 2014
लोकपाल बिल पारित होने के बाद अन्ना हजारे के पास अनशन के लिए कुछ बचा नहीं
खेल का मज़ा यह है कि अकसर पता ही नहीं चलता कि खिलाड़ी कौन है?
जो खेल रहा है, या जो खेलवा रहा है, या जिसे खेलाया जा रहा है, या जिसके साथ खेला जा रहा है? खिलाड़ी का मुहरा मरा या मुहरे ने ही खिलाड़ी को मार दिया, अकसर लोग बस क़यास ही लगाते रह जाते हैं। और जनता की तो बात ही मत कीजिए। वह तो शाश्वत फ़ुटबाल है, कभी इस पैर से लात खाती, कभी उस पैर से पिटती, कभी इस टीम के गोल के जाल में अटकती, कभी उस गोल में फँसती है!
वैसे जनता अकसर सोचती है कि चुनाव के अलाव उसके लिए ही जलाये जाते हैं! कि चलो पाँच साल के ठंडे मौसम के बाद एक बार भी जो कुछ तापने को मिल जाय, वही सही! उसे ख़ुश होने का बहाना चाहिए। ठगे जा कर भी ख़ुशी महसूस होती हो, तो हो। शहर की दुकानों में डिस्काउंट सेल हो या चुनाव की मुफ़्तिया घोषणाएँ, जनता तुरन्त जेब कटा लेती है और वोट लुटा देती है। बिना यह सोचे कि वह किसकी क्या क़ीमत चुका रही है!
अटकते-लटकते आख़िर तेलंगाना का बिल पास हो ही गया! देखा आपने चुनाव के अलाव का चमत्कार! सुनते हैं, नमो जी ने अपनी पार्टी पर बहुत ज़ोर डाल रखा था कि यह मामला चुनाव से पहले निपट जाय! ताकि वह प्रधानमंत्री बनें तो यह बला उनके गले न पड़े। बीजेपी ने अपनी बला टाली और काँग्रेस ने तेलंगाना में अपने वोट पक्के किये। सीमांध्र से वैसे भी उसका पत्ता साफ़ होना था, सो उसने तेलंगाना सेक लिया! पहले लोकपाल, फिर तेलंगाना, दोनों पार्टियों ने क्या ग़ज़ब का एका दिखाया!
उधर, तमिलनाडु में अम्मा ने सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले को हाथोंहाथ लपक लिया। राजीव गाँधी के हत्यारों की फाँसी की सज़ा जैसे ही कोर्ट ने उम्र क़ैद में बदली, अगले ही दिन अम्मा की ममता हिलोरें मारने लगी। उन्होंने आनन-फ़ानन उन सभी की रिहाई का एलान कर दिया। अम्मा ने एक तीर से दो शिकार कर लिये! एक, अम्मा की वोटों वाली रोटियाँ अच्छी पक जायेंगी, दूसरे यह कि काँग्रेस और डीएमके चाहें भी तो चुनावी गठबन्धन न कर पायें। काँग्रेस रिहाई का समर्थन नहीं कर सकती और डीएमके रिहाई का विरोध नहीं कर सकती! वैसे, लोग इन्तज़ार करते रहे कि नमो जी का कोई दहाड़ता-हुँकारता बयान आयेगा इस पर। आख़िर आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई का मुद्दा था यह। उनका प्रिय विषय! लेकिन चुनाव बाद अगर नमो को अम्मा के समर्थन की ज़रूरत पड़ गयी तो? अक़्लमंद लोग कहते हैं कि हर मौक़े पर बोलना अच्छा नहीं होता!
राजीव गाँधी के हत्यारों की रिहाई के एलान के बाद अफ़ज़ल गुरू का मामला उठना ही था। उसकी दया याचिका भी राजीव के हत्यारों की तरह बरसों तक लटकी रही। काँग्रेस पर बार-बार सवाल उठते रहे कि अफ़ज़ल गुरू का मामला वह क्यों लटकाये हुए है। जैसे ही चुनाव नज़दीक़ आने को हुए, फ़ैसला हो गया, फाँसी हो गयी। काँग्रेस के ख़िलाफ़ बीजेपी का एक मुद्दा ख़त्म हो गया! अफ़ज़ल गुरू के मामले पर बीजेपी बड़ा शोर मचाती थी, लेकिन देविन्दरपाल सिंह भुल्लर के मामले पर हमेशा मिमियाती रही। क्योंकि पंजाब में उसका सहयोगी अकाली दल भुल्लर की फाँसी के ख़िलाफ़ है! अफ़ज़ल गुरू, भुल्लर और राजीव के हत्यारों पर अलग-अलग पैमाने क्यों? फिर इनकी दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति का फ़ैसला इतने दिनों तक क्यों लटका रहा? इसीलिए न कि फ़ैसला न लेने के राजनीतिक फ़ायदे या मजबूरियाँ हमेशा भारी पड़ीं!
वैसे मजबूरियाँ किसी से कुछ भी करा देती हैं! अब अन्ना हज़ारे को ही लीजिए। कभी राजनीति से बड़ा मुँह बिचकाते थे, अब ख़ुद राजनीति के प्यादे बने घूम रहे हैं! विधानसभा चुनाव के बाद केजरीवाल से डरी काँग्रेस और बीजेपी को लगा कि लोकपाल ले आओ, वरना केजरीवाल निगल जायेगा। तब अन्ना जी प्रायोजित अनशन पर बैठाये गये! लोकपाल बिल पास हो गया। अन्ना जी ने माला पहन कर ख़ुद लोकपाल का श्रेय ओढ़ लिया! लेकिन लोकपाल के बाद क्या करते? अनशन का भी कोई मुद्दा बचा नहीं था। इसलिए अब ममता बनर्जी का प्रचार करेंगे। बक़ौल अन्ना, वह बहुत सादगी से रहने वाली मुख्यमंत्री हैं, हवाई चप्पल पहनती हैं। लेकिन उनके राज्य में लोकायुक्त अब तक नहीं बना है, यह कोई ख़ास बात नहीं है! पश्चिम बंगाल में मानव अधिकार नाम की चीज़ नहीं है, मुख्यमंत्री को एक कार्टून और एक बच्ची का मासूम-सा सवाल तक बर्दाश्त नहीं होता, तृणमूल काँग्रेस के कार्यकर्ताओं की दिनदहाड़े गुंडई की दिल दहला देनेवाली ख़बरें आम हैं, लेकिन हैरानी है कि अन्ना को यह सब नहीं दिखता!
अन्ना की मजबूरी है कि अपनी पुरानी टीम के टूट जाने के बाद वह अलग-थलग पड़ गये थे। उधर, ममता भी लेफ़्ट फ़्रंट के चलते तीसरे मोर्चे की राजनीति में जगह नहीं बना पायीं। इसलिए दो ‘अकेले’ एक-दूसरे का हाथ बँटाने एकजुट हो गये!
एक थ्योरी यह भी दी जा रही है कि इस खेल के पीछे बीजेपी है। मक़सद है केजरीवाल के वोट काटना। राजनाथ सिंह कह चुके हैं कि पश्चिम बंगाल को केन्द्रीय क़र्ज़ चुकाने से कुछ बरस की छूट मिलनी चाहिए। और ममता बनर्जी भी एलान कर चुकी हैं कि बंगाल का
Saturday, 22 February 2014
हिंदुत्व और कॉरपोरेट जगत का गठजोड़ भारतीयों के लिए एक भयावाह भविष्य का निर्माण करने में लगी है।
किसी भी चुनाव से पहले हिंदुत्व के नाम पर राममंदिर, २००२ के गुजरात दंगे, धारा ३७० आदि अनेक विषय जिनका मुख्यतः हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों से सम्बन्ध है उछाले जाते हैं. देश की सभी राजनीतिक पार्टियां दो मुख्य गुटों में लामबंद हो जाती हैं, जबकि हिन्दू-मुस्लिम दंगों को लेकर दोनों गुटों के रिकोर्ड्स में ख़ास अंतर नहीं है. उपरोक्त विषयों का इस देश की सभ्यता से कोई लेना-देना ही नहीं है.
आपसीसंबंधों को बनाए रखने का काम भी युवा विद्यार्थी ही करें. विद्यार्थी इस बात को गहराई से समझें कि राजनीतिज्ञों की वोट-बैंक पोलिटिक्स इस व्यवस्था के लिए जहर से कम नहीं होगी.
मुज़फ्फ़रनगर का हत्याकांड और अल्पसंख्यकों का विस्थापन बताता है कि फ़ासीवादी शक्ति किस तरह से रूढि़-पोषक खाप पंचायतों, हरित क्रांति तथा पुरुष सत्तावाद के आधार पर खड़ी राजनीति और प्रतिक्रियावादी सामाजिक संस्थाओं से तालमेल बिठाकर उन्हें अपने नियंत्रण में लेती है। उन्होंने नियोजित तरीक़े से ‘लव जिहाद’ का दुष्प्रचार करके सांप्रदायिकता को बहू-बेटी की इज्ज़त का मामला बनाया और एक साथ वर्गीय और जेंडर हिंसा का षडयंत्र रचा, जिसमें हम आज़ादी के बाद सम्पन्न हुये भूस्वामी वर्ग और पूँजीपति वर्ग की आपसी सुलह और कारस्तानियों का सबसे भद्दा रूप देख सकते हैं।
जिस आसानी से और बिना किसी जवाबदेही के भारतीय राज्य, विरोधी आवाज़ों को दबाता जा रहा है, जिस तरह आतंकवाद की झूठी आड़ में निरपराध मुस्लिम नवयुवकों को गिरफ्तार कर लेता है और माओवाद के नाम पर किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता को पकड़ लेता है और यातनाएं देता है, जिस तरह श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ायी जाती हैं, लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों को जिस तरह कुचला जाता है, जिस तरह से बड़े पैमाने पर कश्मीर और उत्तरपूर्व के राज्यों में मानवाधिकार हनन हो रहा है, दलितों और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के मामलों में सरकारी तंत्र कोई कार्रवाई करने के बजाय हमलावरों के बचाव में जिस तरह लग जाता है, और कॉरपोरेट मीडिया तंत्र लोगों को इन चीज़ों की ख़बर तक नहीं देता, यह सब न केवल यह दर्शाता है कि हमारे समाज और राजनीति का संकट गंभीर रूप अखि्तयार कर चुका है बल्कि यह भी बताता है कि हमारे इस संवैधानिक-लोकतांत्रिक निज़ाम के अंदर ही इन सब चीज़ों के लिये गुंजाइश बन चुकी है और यह निज़ाम अब इसी दिशा में आगे जाये, इसकी तैयारी भी पूरी है। मौजूदा फ़ासीवादी मुहिम राज्य की इसी निरंकुशता को एक नयी आपराधिक आक्रामकता और स्थायित्व देने के लक्ष्य से संचालित है। इस संदर्भ में आने वाले आम चुनावों में फ़ासीवादी ताक़तों को नाकामयाब करना बेहद ज़रूरी है।
Thursday, 20 February 2014
हिंदुत्व टेरर असीमानंद और संघ
टेरर गुरू असीमानन्द को लेकर अस्पष्टता आज तक चली आ रही है। उदाहरण के तौर पर देखें कि
क्यों आज तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने असीमानन्द को दिये गये सम्मान- स्पेशल गुरूजी सम्मान- को वापस नहीं लिया जो उसे ‘संघ की निष्ठा से सेवा’ करने के लिये गोलवलकर की जन्मशती पर दिया गया था (2005) ?
आखिर क्यों आज तक संघ से जुड़े वकील उसे कानूनी सहायता प्रदान कर रहे हैं, जब जोधपुर की अपनी पाँच दिनी बैठक के बाद (2010) -जबकि पुलिस ने उसके कई सारे कार्यकर्ताओं को आतंकी घटनाओं में संलिप्तता के चलते जेल में डाला था- उसने यह ऐलान किया था कि वह ऐसी गतिविधियों में मुब्तिला पाये गये किसी को कानूनी सहायता प्रदान नहीं करेगी ?
वे ‘बुरे तत्व’ कौन थे जिनके बारे में संघ ने जोधपुर मीटिंग के बाद सफाई दी थी, जिन्होंने या तो ‘संगठन को त्याग दिया’ या ‘जिन्हें संघ छोड़ने के लिये कहा गया’ और क्यों आज तक संघ से जुड़े और समविचारी संगठनों ने मिल कर – इस आपराधिक और आतंकी गठजोड से तौबा नहीं किया अर्थात् अपने सम्बन्धों की समाप्ति का ऐलान नहीं किया।
संघ-भाजपा नेताओं से असीमानन्द की नज़दीकी के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। डांग जिले में जब असीमानन्द सक्रिय था तब उसके द्वारा आयोजित शबरी कुंभ में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संघ के पूर्व सुप्रीमो के एस सुदर्शन, और वर्तमान सुप्रीमो मोहन भागवत ने हाजिरी लगायी थी। इण्टरनेट पर ऐसे तमाम फोटोग्राफ्स आसानी से उपलब्ध है जो बताते हैं कि किस तरह संघ-भाजपा के यह तमाम महारथी असीमानन्द के आतिथ्य का लाभ उठाते रहे हैं। यह अकारण नहीं था कि नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली गुजरात सरकार ने संघ द्वारा ‘ढूँढे’ इस नए कुंभ के लिये आसानी से फंड उपलब्ध कराए।
अब जहाँ तक संघ का नज़रिया है, तो असीमानन्द का रिकॉर्ड ‘शानदार’ ही था। गुजरात के आदिवासीबहुल डांग में ‘ईसाई मिशनरियों के खिलाफ संघर्ष’ करने के पहले, उसने संघ की तरफ से कई स्थानों पर काम किया था और वह अंदमान में भी सक्रिय रहा था। निश्चित ही संघ के कर्णधारों के लिये यह सोचना भी मुश्किल रहा होगा कि अलसुबह वह अपने तथा अपने सहकर्मियों के अपराधों को लेकर मैजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 के अन्तर्गत लिखित स्वीकृति देगा – जिसे अदालत में सबूत के तौर पर रक्खा जा सकेगा। और इस अपराध स्वीकारोक्ति के बाद संघ के लिये हालात चुनौतीपूर्ण होने वाले थे।
असीमानन्द ने ‘कारवां’ पत्रिका में दिया साक्षात्कार इसकी महज एक बानगी मात्रा है। शायद संघ के समझदारों को समझना होगा कि वह किसी पत्रिका में छपे पन्नों को सिरेसे खारिज कर सकते हैं, मगर जब तक वह हिन्दुत्व आतंकी की खतरनाक परिघटना के सभी आयामों को लेकर अपनी कथित संलिप्तता के मामलों को सीधे सम्बोधित करने की कोशिश न करें, उन्हें उन सवालों का सामना बार बार करना होगा।
त्व आतंकियों- लेफ्टिनन्ट कर्नल पुरोहित और शंकराचार्य दयानन्द पाण्डेय- से अपनी दूरी बना ले, तो यह फायदे का सौदा है; मगर वह इस छोटेसे प्रश्न का जवाब देने के लिये तैयार नहीं दिख रहा था कि आखिर वर्ष 2008 में वहीं संघ और उसके आनुषंगिक संगठन इन्हीं आतंकियों के एवं उनकी आतंकी मोडयूल का समर्थन करने के लिये आमादा थे। क्या इस बात को भूला जा सकता है कि जब इन आतंकियों – साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, पुरोहित, शंकराचार्य दयानन्द पाण्डेय, रमेश उपाध्याय आदि – को पुणे और नासिक की अदालत में पेश किया जा रहा था, तब उन पर पुष्पवर्षा करने के लिये इन्हींे हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ता वहाँ सैंकड़ों की तादाद में एकत्रित थे।
Wednesday, 19 February 2014
कई दशकों से मुसलमानों पर आतंकवाद का लेबल चिपकाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों ने देश में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा मगर सच्चाई को सामने आना होता है ।
आतंकी बम विस्फोटों के लिये गिरफ्तार असीमानन्द के कैरवान में प्रकाशित साक्षात्कार के बारे में भाजपा नेताओं ने इसे काँग्रेस के डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेन्ट का कारनामा बताया है। यह आरोप उस जगह से लगाया जा रहा है जहाँ इस डिपार्टमेन्ट का स्थापना स्थल और हैड क्वार्टर है। भाजपा के फूले से दिखते गुब्बारे में सारी हवा इसी डिपार्टमेन्ट के पम्प से भरी गयी है और यह काम आज से नहीं अपितु जनसंघ के समय से किया जा रहा है। आर एस एस को वर्षों से रयूमर स्पाँसरिंग संघ [अफवाह फैलाऊ संघ] के नाम से भी जाना जाता रहा है। पहले ये लोग मौखिक प्रचार के द्वारा अफवाहें फैलाते थे और बाद में कल्पित आईडी से सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने और गाली गलौज का काम करने लगे। अपनी पहचान को छुपा कर रखना ही इनके अपराधबोध का प्रमाण है।
पर सबसे पहले इस विषयगत साक्षात्कार को लिया जाये। कैरवान दिल्ली प्रैस प्रकाशन समूह की पत्रिका है। इस समूह की प्रमुख हिन्दी पत्रिका सरिता समेत इसमें प्रकाशित सम्पादकीय टिप्पणियों को देखा जाये तो हम पाते हैं कि यह समूह कभी भी काँग्रेस का पक्षधर नहीं रहा है अपितु अधिकतर घटनाओं में इसकी सहमति भाजपा के साथ बनती रही है। इसके संस्थापक विश्वनाथ तो मुक्त कण्ठ से अटलजी के प्रशंसक रहे हैं और वामपंथ की ओर प्रतीत होते झुकाव के आरोप वाले दिनों में इन्दिरा गान्धी की रीतिनीति से गहरी असहमतियाँ प्रकट करते रहे हैं। अब जब कैरवान की किसी पत्रकार द्वारा गत दो वर्षों के दौरान लिये गये कथित साक्षात्कार से संघ परिवार को असुविधा हो रही है तब उसके लिये काँग्रेस को जिम्मेवार ठहराना और उसके पास गलत हथकण्डे वाला एक विभाग होने का मनगढ़न्त आरोप लगाना बिल्कुल ही दूसरी बात है। स्मरणीय है कि पिछले दिनों जब भी काँग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने संघ परिवार के बारे में कुछ कहा है तो भाजपा ने उनके बयान का उत्तर देने की जगह उनके पास डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेन्ट का होना बताया था व छद्म पहचान वाले लोगों से सोशल मीडिया पर गाली गलौज करवाना शुरू करते रहे हैं। रोचक यह है कि जब पत्रकारों ने उनसे उक्त घटना के बारे में जाँच करने की माँग के बारे में सवाल किये तो उनके प्रवक्ताओं ने जाँच की माँग के प्रति कोई रुचि नहीं दर्शायी। स्मरणीय यह भी है कि आज से कुछ साल पहले तक संघ परिवार के लिये आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा होता था किन्तु जैसे ही असीमानन्द, दयानन्द पांडे, प्रज्ञा सिंह आदि की गिरफ्तारियों के माध्यम से आतंकी घटनाओं के नेपथ्य के दृष्य सामने आये तब से इन्होंने आतंकवाद को खतरा बताना बन्द कर दिया। राजनीति में हिंसा का सहारा लेना एक विचार हो सकता है और जो लोग इस विचार में विश्वास रखते हैं वे इसका खतरा उठाने के लिये भी तैयार रहते हैं किन्तु अपने किये हुये काम से मुकरना और उसकी जिम्मेवारियाँ दूसरों पर डालना एक अपराध है जो डर्टी ट्रिक्स में आता है। मालेगाँव के गैर मुस्लिम आरोपियों के यहाँ मुसलमानों जैसी पोषाकें और नकली दाढ़ियाँ भी बरामद की गयी थीं व मडगाँव में आरोपी किसी हिन्दू समारोह में साइकिल पर बाँध कर बम विस्फोट करके हिन्दुओं को उत्तेजित कर साम्प्रदायिक दंगे करवाना चाहते थे किन्तु दुर्भाग्य से वह विस्फोट समयपूर्व ही हो गया और रहस्य खुल गया था। अगर ये डर्टी ट्रिक्स नहीं थीं तो आतंकवाद को देश की प्रमुख समस्या बताने वाले दिनों में उन्होंने इसकी निन्दा तक करने की जरूरत क्यों नहीं समझी?
ज़िस गुजरात का ये बार बार गुणगान करते हैं उसके तीन हजार लोगों की मौत के अगर ये जिम्मेवार नहीं थे तो इन्होंने इन हत्याओं के अपराधियों को पकड़ने के लिये अपने प्रचारित प्रशासनिक कौशल का उपयोग क्यों नहीं किया और बाद में जिन लोगों को अदालत ने दोषी माना व सजायें दीं उन्हें टिकिट देने ही नहीं अपितु मन्त्री बनाने तक में संकोच नहीं किया। क्या उनकी जानकारियाँ इतनी कम थीं कि जिस सत्य को सारी दुनिया जान गयी हो उसे वहाँ की सरकार नहीं जानती थी।
डर्टी ट्रिक्स का यह खेल भाजपा के जनसंघ काल से ही जारी है। इसी अफवाह फैलाऊ संघ के दुष्प्रचार का परिणाम ही महात्मा गान्धी की हत्या थी और आज़ादी के बाद जब देश में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास की नींव रखी गयी तब इन्होंने न केवल खाद के उपयोग के खिलाफ वातावरण बनाया था अपितु पनबिजली योजनाओं के खिलाफ किसानों के बीच यह प्रचार भी किया कि ये सरकार पानी में से बिजली निकाल लेती है जिससे वह सिंचाई के लिये अनुपयुक्त हो जाता है। जब काँग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी या गाय बछड़ा हुआ करता था और मतपत्रों पर क्रॉस का निशान लगाकर मतदान होता था तब ये अफवाहें फैलाते थे कि किसी पशु को जब वध के लिये ले जाया जाता है तब उस पर क्रॉस का निशान बनाया जाता है और काँग्रेस को वोट देने का मतलब गौवंश की हत्या के पाप का भागीदार होना है। कम्युनिस्टों के खिलाफ ये प्रचार करते थे कि वे देश और धर्म द्रोही होते हैं । कुल मिलाकर देश को ब्रिटिश एजेंट ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने देश के विनाश की जिम्मेदारी पूरी वफादारी से की।
कई दशकों से मुसलमानों पर आतंकवाद का लेबल चिपकाने में लगे रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता लेकिन सच्चाई को कब तक छुपाया जा सकता?
आतंकी बम विस्फोटों के लिये गिरफ्तार असीमानन्द के कैरवान में प्रकाशित साक्षात्कार के बारे में भाजपा नेताओं ने इसे काँग्रेस के डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेन्ट का कारनामा बताया है। यह आरोप उस जगह से लगाया जा रहा है जहाँ इस डिपार्टमेन्ट का स्थापना स्थल और हैड क्वार्टर है। भाजपा के फूले से दिखते गुब्बारे में सारी हवा इसी डिपार्टमेन्ट के पम्प से भरी गयी है और यह काम आज से नहीं अपितु जनसंघ के समय से किया जा रहा है। आर एस एस को वर्षों से रयूमर स्पाँसरिंग संघ [अफवाह फैलाऊ संघ] के नाम से भी जाना जाता रहा है। पहले ये लोग मौखिक प्रचार के द्वारा अफवाहें फैलाते थे और बाद में कल्पित आईडी से सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने और गाली गलौज का काम करने लगे। अपनी पहचान को छुपा कर रखना ही इनके अपराधबोध का प्रमाण है।
पर सबसे पहले इस विषयगत साक्षात्कार को लिया जाये। कैरवान दिल्ली प्रैस प्रकाशन समूह की पत्रिका है। इस समूह की प्रमुख हिन्दी पत्रिका सरिता समेत इसमें प्रकाशित सम्पादकीय टिप्पणियों को देखा जाये तो हम पाते हैं कि यह समूह कभी भी काँग्रेस का पक्षधर नहीं रहा है अपितु अधिकतर घटनाओं में इसकी सहमति भाजपा के साथ बनती रही है। इसके संस्थापक विश्वनाथ तो मुक्त कण्ठ से अटलजी के प्रशंसक रहे हैं और वामपंथ की ओर प्रतीत होते झुकाव के आरोप वाले दिनों में इन्दिरा गान्धी की रीतिनीति से गहरी असहमतियाँ प्रकट करते रहे हैं। अब जब कैरवान की किसी पत्रकार द्वारा गत दो वर्षों के दौरान लिये गये कथित साक्षात्कार से संघ परिवार को असुविधा हो रही है तब उसके लिये काँग्रेस को जिम्मेवार ठहराना और उसके पास गलत हथकण्डे वाला एक विभाग होने का मनगढ़न्त आरोप लगाना बिल्कुल ही दूसरी बात है। स्मरणीय है कि पिछले दिनों जब भी काँग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने संघ परिवार के बारे में कुछ कहा है तो भाजपा ने उनके बयान का उत्तर देने की जगह उनके पास डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेन्ट का होना बताया था व छद्म पहचान वाले लोगों से सोशल मीडिया पर गाली गलौज करवाना शुरू करते रहे हैं। रोचक यह है कि जब पत्रकारों ने उनसे उक्त घटना के बारे में जाँच करने की माँग के बारे में सवाल किये तो उनके प्रवक्ताओं ने जाँच की माँग के प्रति कोई रुचि नहीं दर्शायी। स्मरणीय यह भी है कि आज से कुछ साल पहले तक संघ परिवार के लिये आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा होता था किन्तु जैसे ही असीमानन्द, दयानन्द पांडे, प्रज्ञा सिंह आदि की गिरफ्तारियों के माध्यम से आतंकी घटनाओं के नेपथ्य के दृष्य सामने आये तब से इन्होंने आतंकवाद को खतरा बताना बन्द कर दिया। राजनीति में हिंसा का सहारा लेना एक विचार हो सकता है और जो लोग इस विचार में विश्वास रखते हैं वे इसका खतरा उठाने के लिये भी तैयार रहते हैं किन्तु अपने किये हुये काम से मुकरना और उसकी जिम्मेवारियाँ दूसरों पर डालना एक अपराध है जो डर्टी ट्रिक्स में आता है। मालेगाँव के गैर मुस्लिम आरोपियों के यहाँ मुसलमानों जैसी पोषाकें और नकली दाढ़ियाँ भी बरामद की गयी थीं व मडगाँव में आरोपी किसी हिन्दू समारोह में साइकिल पर बाँध कर बम विस्फोट करके हिन्दुओं को उत्तेजित कर साम्प्रदायिक दंगे करवाना चाहते थे किन्तु दुर्भाग्य से वह विस्फोट समयपूर्व ही हो गया और रहस्य खुल गया था। अगर ये डर्टी ट्रिक्स नहीं थीं तो आतंकवाद को देश की प्रमुख समस्या बताने वाले दिनों में उन्होंने इसकी निन्दा तक करने की जरूरत क्यों नहीं समझी?
ज़िस गुजरात का ये बार बार गुणगान करते हैं उसके तीन हजार लोगों की मौत के अगर ये जिम्मेवार नहीं थे तो इन्होंने इन हत्याओं के अपराधियों को पकड़ने के लिये अपने प्रचारित प्रशासनिक कौशल का उपयोग क्यों नहीं किया और बाद में जिन लोगों को अदालत ने दोषी माना व सजायें दीं उन्हें टिकिट देने ही नहीं अपितु मन्त्री बनाने तक में संकोच नहीं किया। क्या उनकी जानकारियाँ इतनी कम थीं कि जिस सत्य को सारी दुनिया जान गयी हो उसे वहाँ की सरकार नहीं जानती थी।
डर्टी ट्रिक्स का यह खेल भाजपा के जनसंघ काल से ही जारी है। इसी अफवाह फैलाऊ संघ के दुष्प्रचार का परिणाम ही महात्मा गान्धी की हत्या थी और आज़ादी के बाद जब देश में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास की नींव रखी गयी तब इन्होंने न केवल खाद के उपयोग के खिलाफ वातावरण बनाया था अपितु पनबिजली योजनाओं के खिलाफ किसानों के बीच यह प्रचार भी किया कि ये सरकार पानी में से बिजली निकाल लेती है जिससे वह सिंचाई के लिये अनुपयुक्त हो जाता है। जब काँग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी या गाय बछड़ा हुआ करता था और मतपत्रों पर क्रॉस का निशान लगाकर मतदान होता था तब ये अफवाहें फैलाते थे कि किसी पशु को जब वध के लिये ले जाया जाता है तब उस पर क्रॉस का निशान बनाया जाता है और काँग्रेस को वोट देने का मतलब गौवंश की हत्या के पाप का भागीदार होना है। कम्युनिस्टों के खिलाफ ये प्रचार करते थे कि वे देश और धर्म द्रोही होते हैं ।
ब्रिटिश के एजेंट ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने हमारे भारत देश को विनाश किया था, करता रहा है, मगर अब हमें आशा है कि हमारे देश वासी संघ की चाल को समझ चुके हैं ।