Monday, 31 March 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय संस्कृति के घोर विरोधी

देश की जनता को अघोषित ड्रेस कोड लागू कर खाकी हाफ पैन्ट और सिर पर काली टोपी रखने के लिये मजबूर करेंगे ।

विदेशी कारों पर बैठेंगे, विदेशी पैसे से संगठन चलायेंगे, विदेशी ज्ञान का उपयोग जीवन स्तर को बढ़ाने में करेंगे और जब संस्कृति की बात आयेगी तब यह लोग हर समझदार दार्शनिक, वैज्ञानिक का विरोध करेंगे और नयी हिन्दुत्व की परिभाषा गढ़ने लगते हैं।

देश की हिन्दुत्व की ठेकेदार संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नये तरीके से परिभाषित किया है। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि नवजवानों को जगह-जगह पीटा जा रहा है, मारा जा रहा है और हद तो यहाँ तक हो गयी है कि महाराष्ट्र के सांगली जनपद में एक लड़की की शादी गधे से फेरे लगवाकर करवायी है। मंगलौर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचार धारा से ओत प्रोत श्री राम सेना ने पब के अन्दर घुसकर लड़के और लड़कियों को बुरी तरह से मारा पीटा। इस घटना के बाद एक लड़की ने आत्म हत्या तक कर ली।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर देने के  लिये संघ की सोच जिम्मेदार है। मानव विरोधी सोच रखने वाले यह लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बारे में सब कुछ जानने के बावजूद भी अपना आतंक पैदा करने के लिए नये-नये हथकण्डे अपनाते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि ऐसे तत्वों और ऐसे संगठनों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जाये। जिससे यह लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति को कलंकित न कर सकें।

Monday, 17 March 2014

मोदी ने दिया ही क्या है गुजरात को ।

पिछले डेढ़-दो साल में नरेंद्र मोदी की गतिविधियों को देखें तो साफ दिखता है कि वे अभी से ही खुद को प्रधानमंत्री मानकर चल रहे हैं. जो लोग राजनीति को देखते-समझते रहे हैं, उनका मानना है कि प्रधानमंत्री बनने के लिए जितनी व्यग्रता नरेंद्र मोदी दिखा रहे हैं उतनी शायद ही किसी ने दिखाई हो.  वे खुद को प्रधानमंत्री मानकर चल रहे हैं. उन्हें मिलने वाले ज्ञापनों को इस तरह से प्रचारित-प्रसारित किया जाता है जैसे वे ज्ञापन प्रधानमंत्री को ही मिले हों. जिस तरह से मोदी पूरे देश के लोगों से जुड़ने की व्यग्रता में सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की उनकी बेचैनी दिखती है. वे मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते. उनके निशाने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी खास तौर पर रहते हैं. शायद ही नरेंद्र मोदी की कोई ऐसी सभा होती है जब वे इन तीनों का मजाक नहीं उड़ाते.

प्रधानमंत्री बनने की इच्छा मन में लिए नरेंद्र मोदी दावा करते हैं कि वे पूरे भारत को गुजरात की तरह विकसित बनाना चाहते हैं. लेकिन इस दावे के बीच वे गुजरात के स्याह पक्ष को भूल जाते हैं, जिसे सुधारने के लिए अभी उन्हें अपने राज्य में ही काफी काम करने की जरूरत है. अगर सरकारी दस्तावेजों को ही देखें और गुजरात के प्रमुख शहरों में जाएं तो पता चलता है कि राज्य में समृद्धि सड़कों, फ्लाइओवरों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के मामले में आई है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि अस्थायी ग्रामीण मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में देश के 20 बड़े राज्यों में गुजरात 14वें स्थान पर है. अस्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात सातवें स्थान पर है. स्थायी ग्रामीण मजदूरों और स्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात क्रमशः 17वें और 18वें स्थान पर है. इसका मतलब यह है कि गुजरात में मजदूरों की हालत बुरी है. उनकी आमदनी कम होने की वजह से उनकी क्रय शक्ति कम है. अध्ययन बताते हैं कि ऐसे परिवारों में कुपोषण और अशिक्षा जैसी स्थितियां सामान्य होती हैं. सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि शिशु मृत्यु दर के मामले में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों में गुजरात सातवें स्थान पर है. अब भी यहां प्रति हजार नवजात बच्चों में से 50 काल के गाल में समा रहे हैं. औसत उम्र के मामले में गुजरात आठवें स्थान पर है. मातृ मृत्यु दर के मामले में भी प्रदेश आठवें स्थान पर है. लिंग अनुपात के मामले में भी गुजरात आठवें स्थान पर है और यहां 1000 पुरुषों की तुलना में 886 महिलाएं ही हैं. गुजरात के शहरी इलाकों में जहां सबसे अधिक विकास की बात मोदी सरकार करती है, वहां यह औसत घटकर 856 पर पहुंच जाता है. चार साल से कम उम्र के बच्चों के आयु वर्ग में यह औसत घटकर 841 पर पहुंच जाता है. पहली से दसवीं कक्षा के बीच पढ़ाई छोड़ने के मामले में गुजरात का औसत 59.11 फीसदी है. यह 56.81 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही बुरा है लेकिन इस मामले में 13 राज्यों का प्रदर्शन गुजरात से अच्छा है. घरों में पानी की आपूर्ति के मामले में गुजरात देश के सभी राज्यों में 14 वें स्थान पर है. यहां के 58 फीसदी घरों में ही नल के जरिए पानी पहुंचता है.
लेकिन इन तथ्यों के उलट मोदी देश भर में ऐसा माहौल बनाने में कामयाब रहे हैं कि उन्होंने गुजरात का खासा विकास किया है और विकास का अगर कोई माॅडल पूरे देश के लिए हो सकता है तो वह है गुजरात माॅडल. मोदी के मुताबिक सारी समस्याओं का समाधान विकास के गुजरात माॅडल में है.
जानकार मानते हैं कि मोदी को बड़ा बनाने में कहीं न कहीं विपक्ष की भी अपनी भूमिका रही है. विपक्ष न तो गुजरात और न ही गुजरात के बाहर मोदी की नाकामियों को सही ढंग से रखने में सफल हुआ है. वहीं मनमोहन सिंह एक ऐसे कमजोर प्रधानमंत्री रहे हैं कि इससे पैदा हुई रिक्तता में मोदी काफी बड़े लगने लगते हैं और इसी में वे खुद यह भूल जाते हैं कि वे भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार मात्र हैं न कि प्रधानमंत्री.

Tuesday, 11 March 2014

भारतीय जनता पार्टी हमेशा दलित विरोधी रही है ।

भारतीय जनता पार्टी बनाने का मकसद सिर्फ दलितों को सत्ता में आने से रोकने का रहा है ।

एक शोध से ये तथ्य सामने आए हैं कि गुजरात में 1 मार्च 2002 से 4 जून 2002 के दौरान हुई गिरफ्तारियों में 2,945 लोग अमदाबाद के तैंतीस थाना क्षेत्रों से थे. इनमें जिन 1577 हिंदुओं को गिरफ्तार बताया गया उनमें 747 केवल अनुसूचित जाति के थे और पिछड़ों की तादाद 797 थी. ब्राह्मण और बनिया केवल दो-दो और पटेल जाति के उन्नीस लोग थे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों और संस्थाओं और उनकी बनाई पार्टी भारतीय जनता पार्टी (पूर्व में जनसंघ) के इतिहास की जो थोड़ी भी जानकारी रखते हैं, वे जानते हैं कि उनकी दलितों समेत पिछड़ी जातियों को दिए जाने वाले संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ उन्मादी कार्रवाइयां हर मौके पर देखी गई हैं. अस्सी के दशक में गुजरात में दो बार आरक्षण-विरोधी उग्र आंदोलन हुए और मतदाताओं द्वारा चुनी गई सरकार को दो बार आसानी से पराजित किया गया.
बिहार में कर्पूरी ठाकुर के शासनकाल में 1978 में मुंगेरीलाल आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग को दिए गए आरक्षण का जबर्दस्त विरोध जनता पार्टी के घटक के रूप में जनसंघ ने किया और सरकार गिरा दी. उत्तर प्रदेश में भी इसे दोहराया गया. कर्पूरी ठाकुर को हटा कर एक दलित जाति के रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बना कर आरक्षण-विरोधी सरकार बनाई गई. संसदीय राजनीति का इतिहास बताता है कि पिछड़ों के बीच जातिवाद और पिछड़ा बनाम दलित की एक रेखा खींचने में मुख्यत: सवर्ण आधार वाली पार्टियों को महारत हासिल रही है.
पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी वाली पिछड़ी जातियों को विशेष अवसर देने का जब कभी प्रयास किया गया तो उसके विरोध के लिए हिंदुत्व का ही सहारा लिया गया और मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववाद के हमले तेज हुए. अस्सी के दशक में गुजरात से लेकर बिहार के जमशेदपुर दंगे को इस सिलसिले में याद किया जा सकता है. पिछड़ों को आरक्षण देने के फैसलों और अल्पसंख्यक-विरोधीहमलों का एक सीधा संबंध है. 1990 के दशक में भी केंद्रीय सेवाओं में वीपी मंडल आयोग की अनुंशसाओं के अनुसार पिछड़ी जातियों को सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला हुआ तो लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या तक की रथयात्रा निकाली और विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया.
आरक्षण-विरोध के दौरान जो उग्रता पैदा हुई उसे 1980 के दशक में राम मंदिर अभियान की तरफ मोड़ा गया और उसे संचालित करने के लिए संघ ने कई नए संगठन बनाए. 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में हिंसक आरक्षण-विरोध और रथयात्रा के उन्मादी माहौल में मुसलमानों के खिलाफ देश भर में हमले हुए. संघ के निर्माण के इतिहास पर नजर डालें तो वह दलितों के राजनीतिक उभार की प्रतिक्रिया में ही बना था. महाराष्ट्र में डॉ भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में हुए दलित आंदोलन की प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र के कट््टरपंथी ब्राह्मणों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी ।
भारतीय जनता पार्टी में केवल वही दलित और मुस्लिम देखने को मिलेंगे जो अपने निजी स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं ।

Monday, 10 March 2014

आजादी से लेकर आज तक जनता आज तक नहीं जीत पाई, क्या अब भी कुछ ऐसा ही होने वाला है?

सोलहवीं लोकसभा के लिए मतदान की तारीखें घोषित हो चुकी हैं। हर अवसर को अपने हिसाब से भुनाने में माहिर हमारे राजनेता नए आवरण धारण कर मतदाता से रूबरू हैं। पुराने आश्वासनों को नए शब्द दे दिए गए हैं और हर पार्टी लगभग एक-सा राग अलाप रही है। सबके निशाने पर भ्रष्टाचार है, सबको राष्ट्रीय स्वाभिमान की चिंता है और हरेक का जोर सिर्फ आर्थिक सुधार पर है। इनमें से कौन सच्चा है, कौन झूठा? कहीं ऐसा तो नहीं कि मामला आधी हकीकत, आधे फसाने का हो? आप जानते हैं, राजनेता और राजनीतिज्ञ पिछले साढ़े छह दशकों से हमारे सपनों को छलते आए हैं।
उजली सुबह के आश्वासनों के साथ जो चुनाव लड़े गए, वे हर बार निराशा का गहरा अंधकार लेकर आए। 1977 का चुनाव कुछ पुराना पड़ गया है, पर इस खौफनाक सिलसिले का पर्दाफाश यहीं से शुरू हुआ। उन दिनों गैर कांग्रेसवाद का नारा लगाते हुए तमाम दल एकजुट हो गए और आपातकाल से घबराई जनता ने उन पर भरोसा कर लिया। भावुक हिन्दुस्तानियों को लगा कि आजादी के 30 साल बाद लोकतंत्र का असली सूरज उदित हुआ है। पर यह क्या! पुराने कांग्रेसी ही सत्ता के शीर्ष पर थे। बरसों नेहरू-इंदिरा मंत्रिमंडल में शामिल रहे मोरारजी ने गद्दी हथिया ली। इससे जगजीवन राम और चरण सिंह पर घड़ों पानी पड़ गया। जिस कांग्रेसी वंशवाद का विरोध कर चौधरी चरण सिंह ने लोगों के दिलों में जगह बनाई थी, उसी कांग्रेस की तथाकथित वंशवादी नेता इंदिरा गांधी के सहयोग से मोरारजी की सरकार गिराकर वह कुछ दिनों के लिए कुरसी पर काबिज हुए।
उनके सियासी कुनबे में भारी फूट थी, इसका लाभ इंदिरा गांधी ने उठाया। चौधरी साहब का उत्थान और पतन, दोनों राजनेताओं के लिए सबक थे। पर हमारे नेता आसानी से कुछ नहीं सीखते। कमाल देखिए! 1989 से 91 के बीच वही कहानी फिर दोहराई गई। एक बार फिर कांग्रेस से निकले वीपी सिंह ने गैर कांग्रेसियों की मदद से अल्पजीवी सरकार बनाई। पिछली बार चरण सिंह असंतुष्ट हुए थे। इस बार चंद्रशेखर की बारी थी। जनता पार्टी की तरह ही राष्ट्रीय मोर्चा सरकार भी कुछ ही महीनों में धराशायी हो गई और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन गए।
सच है कि वीपी से लेकर नरसिंह राव तक प्रधानमंत्री पद की गरिमा बार-बार, तार-तार हुई। बाद में देवगौड़ा और गुजराल के समय में भी देश इसी तकलीफ से गुजरता रहा। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी का दौर आया। वाजपेयी हमेशा विपक्ष की राजनीति करते रहे थे। जनता पार्टी की छोटी-सी हुकूमत छोड़ दें, तो वह कभी सरकार में शामिल नहीं हुए थे। लोगों के मन में बड़ा संदेह था।
इतने लंबे समय तक विपक्ष की बेंचों पर बैठा शख्स किस तरह सार्थक भूमिका निभाएगा? वाजपेयी उम्मीद से कहीं बेहतर प्रधानमंत्री साबित हुए। उन्होंने हमारी विदेश नीति को नया रंग-रोगन दिया और आयाराम-गयाराम की सरकारों से आजिज आ चुके देश को स्थायित्व का सुकून प्रदान किया। उनका व्यक्तित्व कई समकालीन नेताओं के मुकाबले विराट था। इसके साथ ही उनमें विचार व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता थी। इसलिए वह अपना निजी सम्मान बचा सके। यह बात अलग है कि उन्हें भी क्षेत्रीय दलों से समझौता करना पड़ा, जिसकी कीमत खुद वह और भाजपा चुका रहे थे। तीन देवियों, यानी ममता, जयललिता और मायावती ने उन्हें खासा छकाया। इसके बाद अजित सिंह, पासवान और करुणानिधि जैसे उनके पार्टनर थे। ये लोग हवा के रुख के साथ अपनी निष्ठाएं बदलते रहे हैं। मौजूदा चुनाव में भी उनका यही रवैया है। अटल जी के बाद आए मनमोहन सिंह। इसमें कोई दो राय नहीं कि उनकी पहली पारी बहुत शानदार थी, पर दूसरी को जैसे पहले ही क्षण से अधरंग हो गया था।
पार्टी में नई पीढ़ी उदित हो रही थी। दूसरी जीत ने कई कांग्रेसियों को बड़बोला बना दिया था। साथ ही सहयोगी दल अपने समर्थन की कीमत वसूल रहे थे। नरसिंह राव के बाद यह पहला मौका था, जब भ्रष्टाचार के किस्से रस ले-लेकर सुनाए जा रहे थे। एक ईमानदार प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों की धन लिप्सा से अपनी छवि को मटियामेट होता देख रहा था। इस बीच समय भी बदल गया था। सोशल मीडिया लोगों का गुस्सा जाहिर करने का हथियार बन गया था और सिविल सोसायटी नए औजारों के साथ समक्ष खड़ी थी। अन्ना हजारे ने जब लोकपाल के लिए आंदोलन छेड़ा, तो उन्हें मिलने वाला सहयोग यथास्थितिवादियों के लिए खतरे की घंटी था।
अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह एक ही पलड़े में रखे जा सकते हैं। दोनों ही ईमानदार और काबिल हैं, पर साथियों की लालची प्रवृत्ति ने उनके दामन को रह-रहकर दागदार किया। यहां सवाल उठता है कि क्या गठबंधन की राजनीति ही तमाम बलाओं की जड़ है? क्या किसी एक दल को ही बहुमत मिलना चाहिए, ताकि वह अपने एजेंडे को लागू कर सके? यदि हां, तो इतने विशाल देश में, जहां तमाम भाषाएं, वर्ण, जातियां, संप्रदाय और क्षेत्रीय अनिवार्यताएं हैं, वहां यह हो कैसे? पर लोगों को सपने देखने से नहीं रोका जा सकता।

Saturday, 8 March 2014

16 Questions of Arvinda Kejriwal for Narendra Modi

मोदी से केजरीवाल के नहीं, राष्ट्र के सवाल हैं यह। जिन मतदाताओं के जनादेश पर वे राजकाज के अधिकारी बनने वाले हैं, उन्हें मोदी इन सवालों का जवाब क्यों नहीं देते।… केशरिया कयामत हर कीमत पर रोक दी जाये, यह लोक गणराज्य भारत के अस्तित्व का बुनियादी सवाल है।
अरविंद केजरीवाल ने गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्रित्व के भाजपाई दावेदार नरेंद्र मोदी से जो सोलह सवाल पूछे हैं, वे दरअसल अरविंद के सवाल हैं नही, ये सावाल राष्ट्र की ओर से हैं, जो समय समय पर उठाये जाते रहे हैं।
गुजरात दौरे पर अरविन्द ने नरेन्द्र मोदी सरकार पर जमकर कटाक्ष किये हैं। अरविन्द ने कहा है कि, गुजरात में विकास के बारे में नरेंद्र मोदी जो दावे करते हैं, वे खोखले हैं। केजरीवाल ने कहा कि मोदी के तमाम दावे झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। उनके सरकार में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। यदि गुजरात को नरेन्द्र मोदी कृषि प्रधान देश बता रहे हैं तो किसानों के सामने ऐसी स्थित क्यों आ जाती है जिसके लिए उन्हें आत्महत्या करना पड़ रहा है। आइये हम आपको बताते हैं उन सोलह सवालों के बारे में जिनके जवाब अरविंद केजरीवाल नरेन्द्र मोदी से जानना चाहते थे।

केजरीवाल के नरेन्द्र मोदी से  सवाल
��1.  क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद केजी बेसिन से निकली गैस के दाम बढ़ायेंगे?
��2.  पढ़े-लिखे युवाओं को ठेके पर नौकरी क्‍यों दे रहे हैं और उन्‍हें मात्र 5300 रुपये प्रति महीना दे रहे हैं, इतने में कोई कैसे जिन्दगी चलायेगा?
��3.  पिछले दस सालों में राज्‍य में लघु उद्योग क्‍यों बंन्द हुये हैं?
��4.  किसानों की जमीनें बड़े उद्योगपतियों को कौड़ियों के भाव क्‍यों दिये जा रहे? आपने किसानों की जमीन छीनकर अडानी और अंबानी को दे दी है।
��5.  आपके पास कितने निजी हेलिकॉप्‍टर या प्लेन हैं? आपने ये खरीदे हैं या बतौर तोहफा मिला है? आपकी हवाई यात्राओं पर कितना खर्च आता है और इसके लिये पैसे कहांँ से आते हैं?
��6.  गुजरात के सरकारी अस्‍पतालों में इलाज की सुविधा क्‍यों नहीं है?
��7.  आपने हाल में पंजाब में कहा था कि कच्छ के सिख किसानों की जमीन नहीं छीनी जायेगी, तो इस मामले में गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट क्यों गयी है?
��8.  गुजरात में विकास के दावे झूठे हैं, मोदी जी आप बताइए कि गुजरात में कहांँ विकास हुआ है?
��9.  आपके मंत्रिमंडल में दागी मंत्री क्यों शामिल है, बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे दागी मंत्री सरकार का हिस्सा कैसे बने हुये हैं?
��10. मुकेश अंबानी से आपके क्या रिश्ते हैं, आपने अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को मंत्रिमंडल में क्यों जगह दी?
��11. गुजरात में सरकारी स्कूलों के हालात बदहाल क्यों है?
��12. सरकारी दफ्तरों में बहुत ज्यादा करप्शन है, विभागों में भारी भ्रष्टाचार क्यों है?
��13. कच्छ के किसानों को पानी नर्मदा बांध के बावजूद आज तक क्यों नहीं मिला? सारा पानी उद्योगपतियों को दे दिया गया।
��14. गुजरात के किसान बेहाल है। किसान खुदकुशी कर रहे हैं। हाल के वर्षों में गुजरात में 800 किसानों ने खुदकुशी की, क्यों?
��15. प्रदेश में रोजगार का बुरा हाल क्यों है और बेरोजगारी क्यों बढ़ी है?
��16. चार लाख किसानों ने बिजली के लिये कई साल से आवेदन दिया है, उन्हें अब तक बिजली क्यों नहीं मिली है?

हम न आप के समर्थक हैं और न हम राजनीतिक दलों के दफ्तरों के घेराव का समर्थन करते हैं। लेकिन इन सवालों का जबाव नहीं मिला तो हमें पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए। क्या नमोमय भारत ही इस लोकगणराज्य का भविष्य है। जिस नमो की सुनामी है,वह सवालों से भागता है तो देस में लोकतंत्र की क्या हालत होगी। क्या हमें नमोमय भारत बनने देने की मुहिम में शामिल हो जाना चाहिए उनकी जबावदेही से मुकरने के बावजूद, बुनियादी सवाल अब यह है।

��अगर आर्थिक सुधारों और कारपोरेट राज के खिलाफ आपकी लड़ाई है तो आपको यह समझ ही लेना चाहिए केशरिया राष्ट्र में खुदरा कारोबार को पहले ही हरी झंडी दे चुके मोदी अमेरिकी जायनवादी समर्थन से अगर इस देश का प्रधानमंत्री बने तो भारतीय संविधान जो बदलेगा सो बदलेगा, समता और सामाजिक न्याय का जो होगा सो होगा, धर्मोन्माद से देश जो लहूलुहान होगा सो होगा, बल्कि देश की संघीय ढांचा तहस नहस हो जायेगा और पूरा देश तब गुजरात होगा।
कैसा गुजरात, उसकी छवि अरविंद के सवालों की पृष्ठभूमि में साफ तौर पर उभर ही आयी है।

इसके अलावा अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी हितों का असर इतना ज्यादा होगा कि गरीबों की क्या कहें, छोटी पूंजी और मंझोली पूंजी वाले काोबरियं का सत्यानाश भी तय है। पीएफ पेंशन तक बाजार में जो जायेगा, सो जायेगा, विनिवेश और निजीकरण का जो तूफान आयेगा, सो आयेगा, लेकिन करप्रणाली का सारा बोझ आम जनता के कंधे पर डालने का जो स्त्रीविरोधी वर्णवर्चस्वी संघी आर्थिक एजंडा है, उसके तहत जाति धर्म निर्विशेष गरीबों का सफाया हो ही जायेगा। फिर आप अस्मिताओं के ठेकेदारों के मुंह ताकते रह जायेंगे जो अंततः घनघर वंशवादी हैं और जिनकी दृष्टि में भारत नहीं है।��������������

Thursday, 6 March 2014

हमारे भारत में सांसदों की संख्या हजार होनी चाहिए

��मेरा तो मानना है कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए।

��भारत की जनतान्त्रिक व्यवस्था व चुनाव प्रणाली में जो भी वास्तविक या काल्पनिक विसंगतियाँ हैं उन पर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। हम कभी अमेरिका की नकल पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली की माँग उठाते हैं, तो कभी जर्मनी की तर्ज पर आम चुनाव करवाने की वकालत करते हैं। लेकिन अपने विधान मण्डलों को भी कैसे ज्यादा उत्तरदायी बनाया जा सकता है इस पर हमने शायद ही कभी विचार किया हो। अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी आदि देशों में जो व्यवस्था लम्बे समय से चली आ रही है उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि वहाँ जनसंख्या लगभग स्थिर है। इसके विपरीत भारत में लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण अनुपातहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। एक लोकसभा सदस्य से कैसे उम्मीद की जाये कि वह पच्चीस या तीस लाख जनता का प्रतिनिधित्व सही ढंग से कर पाएगा? इसी तरह विधानसभा सदस्यों पर भी 1952 के मुकाबले आज चार गुना अधिक जनता का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। यहाँ इस विपर्यय पर भी ध्यान जाता है कि कई जगह नगरीय निकायों में चुने गये प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दिल्ली नगर निगम को एक साल पहले ही तीन में हिस्सों बाँट दिया गया है। गरज यह कि जो फार्मूला नगर निगम के स्तर पर उपयोगी है उसे प्रदेश व देश के स्तर पर किस रूप में कहाँ तक उपयोगी है इस पर चर्चा करना लाजिमी है।
मेरा तो मानना है कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए। अगर बारह सौ हों तो और बेहतर। इसे लेकर कुछ साल पहले बहस चली थी जो आगे नहीं बढ़ पाई। जिन राज्यों की जनसंख्या स्थिर है उन्हें आशंका थी कि लोकसभा का स्वरूप वृहद् हो जाने से उनके महत्व में कमी आ जायेगी और उनकी बातों की अनसुनी होने लगेगी। इस चिंता में सत्य का अंश हो सकता है लेकिन बहस को वहीं के वहीं समेटने के बजाय बेहतर होता कि सभी पक्षों की आशंका और आपत्तियों का निराकरण कैसे हो इसे ध्यान में रखकर बहस आगे बढ़ाई जाती।

��इस सन्दर्भ में आज हमारे संसद सदस्यों और विधायकों पर कितना शारीरिक और मानसिक दबाव है इस ओर हमारी तवज्जो जाना चाहिए। यह सच है कि निर्वाचित प्रतिनिधि सदन की कार्रवाई में वांछित रुचि नहीं लेते। इस पर उनकी लगातार आलोचना भी होती है किन्तु दूसरी तरफ अपने क्षेत्र की जनता से बचने का कोई उपाय उनके पास नहीं है। वे मतदाताओं की नाराजगी झेलने की जोखिम उठाने में खुद को असमर्थ पाते हैं। अपने क्षेत्र में एक दिन में उन्हें कितने लोगों से मिलना होता है, कितने कार्यक्रमों में शिरकत करना पड़ती है, कितने आवेदन पत्र उन्हें मिलते हैं इसका मानो कोई हिसाब ही नहीं है। अमूमन जब हम उनके कामकाज की समीक्षा करते हैं तो उनकी इस मजबूरी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। सोचिए कि आज यदि एक विधायक को दो लाख की जगह उसके आधे याने एक लाख जनता की नुमाइंदगी करने की व्यवस्था हो तो फिर उनसे सभी मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है या नहीं??������