हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए हर तरह की मुश्किलें बर्दाश्त करके देश को आज़ादी दिलाने वालों में हज़रत शेखुल हिन्द मौलना महमूद हसन का नाम सबसे ऊपर आता है| आप दारुल उलूम देवबंद के शेखुल हदीस और पहले सपूत थे| अध्यन और अध्यापन आपकी दिनचर्या थी लेकिन जब देश पर काबिज़ विदेशी ताकतों ने हिन्दुस्तानियों को प्रताड़ित करने और मुल्क को लूटने खसोटने की हद कर दी तो कौम व मुल्क की मोहब्बत से सराबोर स्व. मौलाना महमूद हसन अंजाम से बेपरवाह होकर अपने समय की सबसे शक्तिशाली सत्ता से टकरा गए | अपने शागिर्दों के दिलों में देश की आज़ादी ज़ज्बा भर दिया और स्वयं भी तन मन और धन से देश की आज़ादी के लिए हर तरह की क़ुरबानी देने को तैयार हो गए|
मौलाना महमूदुल हसन देवबंदी का "एकता का सिद्धांत" आज़ादी का पेश खेमा साबित हुआ| आपने बिना किसी भेदभाव, धर्म व सम्प्रदाय तमाम हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजों के खिलाफ एक प्लेटफार्म पर जमा किया| गाँधी जी को महात्मा का नाम दिया और देश के कोने कोने में जाकर आज़ादी के आन्दोलन को धार दी जिसके कारण उन्हें तीन वर्ष से अधिक समय तक माल्टा की जेल में प्रताड़ना सहनी पड़ी|
हज़रात शेखुल हिन्द जमीअतुल ओलेमाए हिन्द के अग्रणी और संस्थापक थे| आप ही के हुक्म पर हज़रात मुफ़्ती किफ़ायत उल्लाह ने दिल्ली में संयुक्त मंच के तौर पर 1919 में जमीअतुल ओलेमाए हिन्द बुनियाद डाली जो अपनी संस्थापना के पहले दिन से ही ओलेमाओं की सरपरस्ती में कौम व मिल्लत की मुमायण खिदमात अंजाम दे रही है|
श्री शेष नारायण सिंह जी मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं, शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे, बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये... प्रिंट, रेडियो और टेलीविज़न में काम किया। इन्होंने 1920 से 1947 तक की महात्मा गांधी के जीवन के उस पहलू पर काम किया है, जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। अब मुख्य रूप से लिखने पढ़ने के काम में लगे हैं। उनका यह लेख ‘‘हमारी आज़ादी की विरासत का केन्द्र है देवबंद’’
वास्तव में देवबंद का दारूल उलूम प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र होने के साथ-साथ हमारी आज़ादी की लड़ाई की सबसे महत्वपूर्ण विरासत भी है। हिन्दू-मुस्लिम एकता का जो संदेश महात्मा गांधी ने दिया था, दारूल उलूम से उसके समर्थन में सबसे ज़बरदस्त आवाज़ उठी थी। 1930 में जब इलाहाबाद में संपन्न हुए मुस्लिम लीग के सम्मेलन में डा. मुहम्मद इक़बाल ने अलग मुस्लिम राज्य की बात की तो दारूल उलूम के विख्यात क़ानूनविद मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने उसकी मुख़ालिफत की थी। उनकी प्रेरणा से ही बड़ी संख्या में मुसलमानों ने महात्मा गांधी की अगुवाई में नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार क़रीब 12 हज़ार मुसलमानों ने नमक सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तारी दी थी। दारूल उलूम के विद्वानों की अगुवाई में चलने वाला संगठन जमीअतुल उलेमा-ए-हिंद आज़ादी की लड़ाई के सबसे अगले दस्ते का नेतृत्व कर रहा था। आजकल देवबंद शब्द का उल्लेख आते ही कुछ अज्ञानी प्रगतिशील लोग ऊल-जलूल बयान देने लगते हैं और ऐसा माहौल बनाते हैं गोया देवबंद से संबंधित हर व्यक्ति बहुत ही ख़तरनाक होता है और बात बात पर बम चला देता है। पिछले कुछ दिनों से वहां के फतवों पर भी मीडिया की टेढ़ी नज़र है। देवबंद के दारूल उलूम के रोज़मर्रा के कामकाज को अर्धशिक्षित पत्रकार, साम्प्रदायिक चश्मे से पेश करने की कोशिश करते हैं जिसका विरोध किया जाना चाहिए। 1857 में आज़ादी की लड़ाई में क़ौम हाजी इमादादुल्लाह के नेतृत्व में इकट्ठा हुई थी। वे 1857 में मक्का चले गए थे। उनके दो प्रमुख अनुयायियों मौलाना मुहम्मद क़ासिम नानौतवी और मौलाना रशीद अहमद गंगोही ने देवबंद में दारूल उलूम की स्थापना करने वालों की अगुवाई की थी। यही वह दौर था जब यूरोपीय साम्राज्यवाद एशिया में अपनी जड़े मज़बूत कर रहा था। अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपी साम्राज्यवाद का विरोध सैय्यद जमालुद्दीन कर रहे थे। जब वे भारत आए तो देवबंद के मदरसे में उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ और अंग्रेज़ों की सत्ता को उखाड़ फैंकने की कोशिश को और ताक़त मिली। जब 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई तो दारूल उलूम के प्रमुख मौलाना रशीद अहमद गंगोही थे। आपने फ़तवा दिया कि शाह अब्दुल अज़ीज़ का फ़तवा है कि भारत दारूल-हर्ब है।
इसलिए मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करें। उन्होंने कहा कि आज़ादी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिन्दुओं को साथ लेकर संघर्ष करना शरीअत के लिहाज़ से भी बिल्कुल दुरूस्त है। वें भारत की पूरी आज़ादी के हिमायती थे, इसलिए उन्होंने कांग्रेस में शामिल न होने का फैसला किया। क्योंकि कांग्रेस 1885 में पूरी आज़ादी की बात नहीं कर रही थी, लेकिन उनकी प्रेरणा से बड़ी संख्या में मुसलमानों ने कांग्रेस की सदस्यता ली और आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गये। इतिहास गवाह है कि देवबंद के उलेमा दंगों के दौरान भी भारत की आज़ादी और राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े पक्षधर के रूप में खड़े रहते थे। देवबंद के बड़े समर्थकों में मौलाना शिबली नोमानी का नाम भी लिया जा सकता है। उनके कुछ मतभेद भी थे, लेकिन आज़ादी की लड़ाई के मसले पर उन्होंने देवबंद का पूरी तरह से समर्थन किया। सर सैय्यद अहमद ख़ां की मृत्यु तक वे अलीगढ़ में शिक्षक रहे लेकिन अंग्रेज़ी राज के मामले में वे सर सैय्यद से अलग राय रखते थे। प्रोफेसर ताराचंद ने अपनी किताब ‘भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास’ में साफ लिखा है कि देवबंद के दारूल उलूम ने हर उस आंदोलन का समर्थन किया जो भारत से अंग्रेज़ों को खदेड़ने के लिए चलाया गया था। 1857 के जिन बाग़ियों ने देवबंद में धार्मिक मदरसे की स्थापना के उनके प्रमुख उद्देश्यों में भारत की सरज़मीन से मुहब्बत भी थी। कलाम-ए-पाक और हदीस की शिक्षा तो स्कूल का मुख्य काम था लेकिन उनके बुनियादी सिद्धांतों में यह भी था कि विदेशी सत्ता ख़त्म करने के लिए जिहाद की भावना को हमेशा ज़िंदा रखा जाए। आज कल जिहाद शब्द के भी अजीबो ग़रीब अर्थ बताये जा रहे हैं। यहां इतना ही कह देना क़ाफी होगा कि 1857 में जिन बाग़ी सैनिकों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ सब कुछ दांव पर लगा दिया था वे सभी अपने आपको जिहादी ही कहते थे। यह जिहादी हिन्दू भी थे और मुसलमान भी और सबका मक़सद एक ही था विदेशी शासक को पराजित करना।
मौलाना रशीद अहमद गंगोही के बाद दारूल उलूम के प्रमुख मौलाना महमूद उल हसल बने। उनकी ज़िंदगी का मक़सद ही भारत की आज़ादी था। यहां तक कि कांग्रेस ने बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरी स्वतंत्रता का नारा दिया। लेकिन मौलाना महमूद उल हसन ने 1905 में ही पूर्ण स्वतंत्रता की अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने भारत से अंग्रेज़ों को भगा देने के लिए एक मिशन की स्थापना की जिसका मुख्यालय देवबंद में बनाया गया। मिशन की शाखाएं दिल्ली, दीनापुर, अमरोट, करंजी खेड़ा और यागिस्तान में बनाई गयीं थीं।
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