इतिहास में एक परम्परा रही है कि किसी भी व्यक्तित्व को समझने के लिए ‘उसी जैसा’ व्यक्ति इतिहास की गर्त में खंघाला जाता है, इतिहास के विद्यार्थियों के पास ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब वह किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को समझने के लिए अतीत की धारा में आगे-पीछे होते हैं। कभी किसी को ‘कश्मीर का अकबर’ तो कभी किसी को ‘भारत का नेपोलियन’ कह कर उसे आंकता है। अभी हाल में ही भारत में तमाम लोगों ने अन्ना हजारे को गांधी के सापेक्ष करके अतीत को खंघाला। खैर अभी हाल में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी को हिटलर कह कर हमें फिर से अतीत की धारा में पीछे जाने के लिए विवश किया है। पूरी भारतीय राजनीति में हिटलर (जर्मनी का) फिर से चर्चा में है- आखिर कौन है ये हिटलर? नरेन्द्र मोदी से उसका क्या रिश्ता है? मोदी जिस संघ परिवार में खेल-कूद कर बड़े हुए हैं क्या उसकी विचारधारा से हिटलर जुड़ा हुआ है? ये सारे सवाल आज राजनैतिक विश्लेषकों और मीडिया द्वारा उछाले जा रहे हैं।
हमें नरेन्द्र मोदी को समझने के लिए अतीत की धारा में लौटाना होगा- आॅस्ट्रिया के एक छोटे से शहर ब्रानों में, जहाँ 20 अप्रैल 1889 को हिटलर ने एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लिया, एक सैनिक के तौर पर हिटलर ने अपना जीवन शुरू किया परन्तु बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती गयी और अपनी जालसाजी और कुटिलता के चलते हिटलर जर्मनी का फ्यूहरर (प्रधान नेता) बन बैठा। इसी क्रम में हिटलर ने राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन श्रम दल (नात्सीदल) के अध्यक्ष डेªक्सलर को भी अपने रास्ते से हटा दिया। इसी क्रम में यदि मोदी को देखा जाए तो हम आसानी से देख सकते हैं कि किस तरह नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए भाजपा के संस्थापक सदस्यों को ही अपने रास्ते से हटा दिया। लालकृष्ण आडवाणी सरीखे नेता जो भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ थे को भी नहीं बक्शा। इस क्रम में जसवंत सिंह, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, लाल जी टंडन जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी संघ परिवार के साथ मिलकर अपने रास्ते से लगभग हटा ही दिया है। ये नेता आज अपनी सीटों से बेदखल होकर अपनी स्वयं की जीत-हार में ही परेशान हैं।
हिटलर ने तात्कालीन जर्मनी के आर्थिक हालात का बड़ी चतुराई के साथ लाभ उठाया था। 1929 में आयी महा आर्थिक मंदी ने जर्मनी की व्यवस्था को चैपट कर दिया था। उस समय जर्मनी की सड़कों पर बड़ी संख्या में बेरोजगार गले में तख्ती लटकाये- ‘मैं कोई भी काम करने को तैयार हूँ’ दिखायी देने लगे थे। पूँजीपतियों को भय सताने लगा था कि कहीं जर्मनी में साम्यवादी क्रान्ति न हो जाये। आज भारत भी आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लूट-खसोट की नीतियों से पीडि़त है। अर्थव्यवस्था के हालात ठीक नहीं हैं, वस्तुतः इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब फासिस्ट संगठन अपना प्रभाव बढ़ाते हैं तो पूंजीपति वर्ग उनके साथ जुड़ जाता है। आज जब नरेन्द्र मोदी अम्बानी और आडानी के पैसों से उड़नखटोले में उड़ कर विकास का जुमला उछाल रहे हैं तो अनायास ही हिटलर के साथ जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बन्धों की यादें ताजा नहीं हो रही हैं। यहाँ जर्मनी के इतिहास के पन्नों को पलटना बेहद उपयोगी होगा क्योंकि प्रश्न हिटलर और जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बंधों अथवा मोदी और अम्बानी के सम्बंधों का नहीं है बल्कि इसका है कि इन सम्बन्धों के चलते मनुष्यता को कैसे-कैसे दुख झेलने पड़ते हैं।
हिटलर के पतन के बाद न्यूरेमबर्ग में नाजियों के खिलाफ मुकदमा चला, जिसमें बाल्थर फंक नामक का एक व्यक्ति भी था जो जर्मनी के प्रसिद्ध आर्थिक अखबार ‘बर्लिनर वोरसेन जेतुंग’ का सम्पादक था और पूंजीपतियों और हिटलर के बीच का महत्वपूर्ण कड़ी भी। उसने कई रहस्यों को उजागर किया जिससे हिटलर और पूंजीपतियों का संबंध उजागर हुआ। हिटलर ने कोयला खानों के मालिकों से पैसे वसूलने के लिए ‘सर ट्रेजरी’ नाम से एक फण्ड भी बनाया था। फंक ने एक लम्बी लिस्ट बतायी जिसमें काॅर्टन आई.जी. फाखेन, वान स्निजलर, अगस्त दिहन, जैसे उद्योगपति थे जो हिटलर को अपने स्वार्थों के लिए चंदा देते थे। आज भारत में खास कर के गुजरात में मोदी ने अडानी को 1 रू0 प्रति वर्गफुट से हिसाब से जमीने दी हैं, से साफ जाहिर है कि आडानी और अम्बानी मोदी को किस लिए पैसे दे रहे हैं? क्यों भारत के दो-तिहाई पूंजीपति मोदी को बतौर प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं?
हिटलर ने अपना प्रचार करवाने के लिए एक पोस्टर जारी किया था- जिसमें सिर्फ हिटलर का एक फोटो था। यानि नाजीवादी पार्टी के अन्य नेताओं ने हिटलर के समक्ष समर्पण कर दिया था। भारत के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम हैं जब एक व्यक्ति ने पूरी पार्टी को हाइजैक कर लिया हो- तभी तो आज ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा उछाला जा रहा है। भारत के इतिहास में कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने के लिए शायद ही इतना उतावला या हड़बड़ी में रहा हो जैसा मोदी दिख रहे हैं। संसदीय गरिमा को ताक पर रखकर ‘प्रेसीडेन्सियल फोबिया’ से ग्रसित मोदी ‘प्रधानमंत्री पद को सर्कस के जोकर का पद बना दिया है ।
बचपन मे मुझे मेरे शिक्षक ने बताया कि लिखने से याद्दाश्त मजबूत होती है तब से लेखन का सिलसिला जारी है
Friday, 11 April 2014
कल का हिटलर आज का मोदी
Saturday, 5 April 2014
कोबरा स्टिंग ऑपरेशन जन्मभूमि ( बाबरी मस्जिद विध्वंस)
कोबरापोस्ट ने ऑपरेशन जन्मभूमि के तहत बाबरी मस्जिद के बारे में बीजेपी की हिकमते अमली के रा़ज पर से पर्दा उठाते हुए सनसनीखेज खुलासा किया है कि मस्जिद को गिराने की जानकारी न सिर्फ कई बीजेपी लीडरों को थी, बल्कि इसके लिए कारसेवकों को तरबियत दी गयी थी।
कोबरपोस्ट का दावा है कि इस झगड़े की बुनियाद मे 1949 की एक घटना है, जब रामलला की मूर्ति को गुपचुप तरीके से बाबरी मस्जिद मे रखा दिया गया था। इस वाकिये के चश्मदीद गवाह कोई और नहीं, बल्कि राम जन्मभूमि तहरीक में अहम रोल निभाने वाले बी एल शर्मा प्रेम हैं। कोबरा पोस्ट ने 23 लीडरों को स्टिंग का वीडियो जारी किया है।
शर्मा का कहना है कि वो तब अयोध्या मे मिलिट्री पुलिस मे एक वारंट आफिसर के रूप मे तैनात थे। यह सब उनकी आंखों के सामने हुआ। तब अयोध्या के पुजारी रामचंद्र दास उनकी यूनिट मे बराबर आया जाया करते थे। एक दिन राम चन्द्र दास ने उन्हे बताया कि रामलला अमुक दिन ऐसे प्रकट होंगे, तो वहां अपने साथियों को लेकर आना। कोबरा ने दावा किया है कि उस दिन अयोध्या में जो कुछ हुआ, उसकी जानकारी लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह समेत नरसिंह राव को भी थी।
कोबरापोस्ट का दावा है कि बाबरी मस्जिद को गिराने का साजिश विश्व हिन्दू परिषद और शिव सेना ने अलग अलग रची थी। इन दोनों संगठनो ने 6 दिसंबर से काफी पहले प्लान के तहत अपने कारकुनों को इस मकसद के लिए ट्रेनिंग दी थी। आरएसएस के तरबियत याफ्ता काकारकुनों का एक दस्ता भी बनाया गया था, जिसको बलिदानी जत्था भी कहा गया।
विहिप की युवा इकाई बजरंग दल के कारकुनों ने गुजरात के सरखेज मे इस मकसद के लिए एक महीने की तरबिय़त हासिल की। दूसरी ओर शिवसेना ने भी अपने कारकुनों के लिए ऐसा ही एक तरबिय़त कैंप भिंड-मुरैना मे लगाया था। इस मे लोगों को पहाड़ियों पर चढ़ने और खुदाई करने की तरबिय़त दी गयी थी।
6 दिसंबर को मस्जिद को तोड़ने के मकसद से छैनी, घन, गैंती, फावडा, सब्बल और दूसरी तरह के औजारों को खासी तादाद मे जुटा लिया गया था।
राम कथा मंच एक क़सम भी दिलायी गयी थी, उस वक़्त आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर और आचार्य धर्मेंद्र सहित कई जाने माने लीड़र और संत लोग थे। इसके फौरी बाद बाबरी मस्जिद को तोड़ने का काम शुरू कर दिया गया था।
वीएचपी के नेताओं ने बाबरी तो़डने के मकसद से कुछ दिन पहले अलग अलग जगहों पर 1200 संघ कार्यकर्ताओं को मिला कर एक सेना का कियाम किया था। इस गुप्त सेना का नाम लक्ष्मण सेना था। इस सेना को सभी सामान मुहय्या कराने और उनकी रहनुमाई का जिम्मा राम गुप्ता को सौपा गया था। इस सेना का नारा जय शेशावतार था।
दूसरी जानिब शिवसेना ने भी इसी तर्ज पर अयोध्या मे अपने मुक़ामी कारकुनों की एक सेना बना रखी थी। इसका नाम प्रताप सेना था। इसी सेना ने शिवसेना के बाबरी मस्जिद गिराने के लिए जरूरी सामान और मदद मुहय्या कराई थी। आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल के नेता के लीडरों के अलावा बाल ठाकरे और राज ठाकरे को भी इन सरगर्मियों की जानकारी थी और वे राब्ते में थे।
Muslims of Gujarat During Modi ,s Government
अगर हम 2002 के गुजरात जनसंहार को भूल भी जायें तो भी आतंकवाद के दमन के नाम पर सिलसिलेवार ढंग से हो रही फर्जी मुठभेड़ो में मुसलमानों की हत्या को हम कैसे भुला पाएंगे। कुछ देर के लिए अगर हम इन क़ानूनी हत्यारों को भी भूल जाएँ और प्रदेश में पिछले 10 वर्षों के दौरान मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक विकास पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि मोदी सरकार ने गुजरात के मुसलमानों के साथ किस प्रकार की भेदभाव की नीति को सुविचारित ढंग से आपनाया है।
गुजरात में मुसलमानों की जनसंख्या गुजरात की कुल जनसंख्या का 9.7% है पर वर्तमान सरकार द्वारा पिछले एक दशक में चलाये गए SJSRY और NSAP योजना को छोड़कर ज्यादातर योजनाओं में मुसलमानों की भागीदारी उनके जनसंख्या के अनुपात से कम ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 178)। उदहारण के तौर पर कृषि बीमा योजना में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 3.5% है, जबकि पॉवर टिलर आवंटन के मामले में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 1.4% और ट्रेक्टर के मामले में 4.1% है। गुजरात में मोदी के शासन काल में सहकारी बैंक या ग्रामीण विकास बैंक से वहां के मुसलमानों को किसी प्रकार का कोई कर्ज नहीं मिला है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-75)।
बचत और क्रेडिट सोसाइटी बनाने और छोटे उद्योग लगाने के मामले में गुजरात के मुस्लिम वहां के हिन्दुओं से दोगुने आगे हैं लेकिन इस सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता और प्रशिक्षण का लाभ देने में हिन्दुओं को कहीं अधिक महत्व दिया जाता है। गुजरात में दिए गए कुल प्रशिक्षण का लाभ उठाने में वहां के मुसलमानों की भागीदारी मात्र 5.5% ही है जबकि उद्योग लगाने के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले भवनों में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 4.5% ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-5)। गुजरात के विभिन्न बैंक में खुले कुल खातो में से मुसलमानों की हिस्सेदारी 12% है जबकि प्रदेश में बैंक द्वारा वितरित किये गए कुल कर्जो में मुसलमानों की हिस्सेदारी मात्र 2.6% है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 127)। गुजरात का प्रत्येक मुसलमान वहां के बैंक में प्रति हिन्दू द्वारा जमा किये गए धन से 20% अधिक पैसे जमा करता है और इसके बावजूद कर्ज देने के मामले में मुसलमानों को हिन्दुओं की तुलना में कम महत्व दिया जाता है।
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) योजना के तहत 2000-01 और 2005-06 के दौरान गुजरात सरकार द्वारा दिए गए कुल 3133.77 करोड़ के कर्जो में से मुसलमानों को मात्र 0.44 करोड़ दिया गया। इसी प्रकार नाबार्ड द्वारा कर्जों की पुनर्वित्त में मुसलमानों को 1.76% ही हिस्सा दिया गया (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 351-53)।
2004-05 में गुजरात में 41% मुसलमान सेवा क्षेत्र में नौकरी करते थे जो कि 2009-10 में घटकर 31.7% रह गया। उसी प्रकार 2004-05 में 59% मुसलमान स्वरोज़गार करते थे जो कि 2009-10 घटकर 53%रह गया। इसी काल के दौरान मुसलमानों कि वेतनभोगी नौकरियों में भागीदारी 17.5%से घटकर 14% हो गई। यह भी गौर करने वाली बात है कि गुजरात में अनियमित मजदूरी कि कुल भागीदारी में मुसलमानों का हिस्सा इसी कालावधि के दौरान 23% से बढ़कर 32% हो गया है। इसका मतलब तो यही है कि मोदी के शासनकाल के दौरान गुजरात में मुसलमानों को निम्न दर्जे के रोजगारों की ओर धकेला जा रहा है। 2001 में जब गुजरात कि कुल साक्षरता दर 69.1% थी तब वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 73.5% थी जबकि 2007-08 में जब गुजरात की कुल साक्षरता दर 74.9% हो गई तब भी वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 74.3% है। 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों द्वारा किसी प्रकार के शैक्षणिक संस्थानों में नामांकित होने के मामले में गुजरात के हिन्दू और मुस्लिम समाज में औसत अंतर राष्ट्रीय औसत से कम है (अतुल सूद, पृ.स. 270, तालिका 9.9)। क्या इन सब के पीछे गुजरात सरकार के द्वारा मुसलमानों के साथ किये जाने वाले भेदभाव की नीति जिम्मेदार नहीं है?
मोदी जी गुजरात में मुसलमानों में शिक्षा के प्रति रुझान में आई कमी के लिए मदरसा को भी दोषी नहीं ठहरा सकते है क्योंकि पूरे भारत में गुजरात ही एक ऐसा प्रदेश है जहाँ मदरसा सबसे कम प्रचलित है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 293)।
लाँकि गुजरात के मुसलमानों की यह स्थिति हमेशा ऐसी ही नहीं थी। 1999-2000 में गुजरात में मुसलमानों में स्वरोजगार गुजरात के हिन्दू समुदाय से अधिक थी लेकिन 2009-10 आते-आते स्थिति बिलकुल ही विपरीत हो गई है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 343)। दूसरी तरफ यदि हम ग्रामीण मजदूरों में मुसलमानों की भागीदारी को देखें तो ये पता चलता है कि 1999-2000 में मुसलमानों की इस क्षेत्र में भागीदारी हिन्दुओं से कम थी जो की आज बिलकुल उल्टा हो गया है। निष्कर्ष साफ़ है, गुजरात के मुसलमानों को मजबूरन रोजगार के लिए स्वरोजगार, व्यापर और विनिर्माण जैसे अच्छे रोजगारों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी का काम करने को मजबूर हैं ।
आखिर विकास हो कहाँ रहा है मंगल ग्रह पर?
Monday, 31 March 2014
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय संस्कृति के घोर विरोधी
देश की जनता को अघोषित ड्रेस कोड लागू कर खाकी हाफ पैन्ट और सिर पर काली टोपी रखने के लिये मजबूर करेंगे ।
विदेशी कारों पर बैठेंगे, विदेशी पैसे से संगठन चलायेंगे, विदेशी ज्ञान का उपयोग जीवन स्तर को बढ़ाने में करेंगे और जब संस्कृति की बात आयेगी तब यह लोग हर समझदार दार्शनिक, वैज्ञानिक का विरोध करेंगे और नयी हिन्दुत्व की परिभाषा गढ़ने लगते हैं।
देश की हिन्दुत्व की ठेकेदार संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नये तरीके से परिभाषित किया है। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि नवजवानों को जगह-जगह पीटा जा रहा है, मारा जा रहा है और हद तो यहाँ तक हो गयी है कि महाराष्ट्र के सांगली जनपद में एक लड़की की शादी गधे से फेरे लगवाकर करवायी है। मंगलौर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचार धारा से ओत प्रोत श्री राम सेना ने पब के अन्दर घुसकर लड़के और लड़कियों को बुरी तरह से मारा पीटा। इस घटना के बाद एक लड़की ने आत्म हत्या तक कर ली।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर देने के लिये संघ की सोच जिम्मेदार है। मानव विरोधी सोच रखने वाले यह लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बारे में सब कुछ जानने के बावजूद भी अपना आतंक पैदा करने के लिए नये-नये हथकण्डे अपनाते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि ऐसे तत्वों और ऐसे संगठनों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जाये। जिससे यह लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति को कलंकित न कर सकें।
Monday, 17 March 2014
मोदी ने दिया ही क्या है गुजरात को ।
पिछले डेढ़-दो साल में नरेंद्र मोदी की गतिविधियों को देखें तो साफ दिखता है कि वे अभी से ही खुद को प्रधानमंत्री मानकर चल रहे हैं. जो लोग राजनीति को देखते-समझते रहे हैं, उनका मानना है कि प्रधानमंत्री बनने के लिए जितनी व्यग्रता नरेंद्र मोदी दिखा रहे हैं उतनी शायद ही किसी ने दिखाई हो. वे खुद को प्रधानमंत्री मानकर चल रहे हैं. उन्हें मिलने वाले ज्ञापनों को इस तरह से प्रचारित-प्रसारित किया जाता है जैसे वे ज्ञापन प्रधानमंत्री को ही मिले हों. जिस तरह से मोदी पूरे देश के लोगों से जुड़ने की व्यग्रता में सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की उनकी बेचैनी दिखती है. वे मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते. उनके निशाने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी खास तौर पर रहते हैं. शायद ही नरेंद्र मोदी की कोई ऐसी सभा होती है जब वे इन तीनों का मजाक नहीं उड़ाते.
प्रधानमंत्री बनने की इच्छा मन में लिए नरेंद्र मोदी दावा करते हैं कि वे पूरे भारत को गुजरात की तरह विकसित बनाना चाहते हैं. लेकिन इस दावे के बीच वे गुजरात के स्याह पक्ष को भूल जाते हैं, जिसे सुधारने के लिए अभी उन्हें अपने राज्य में ही काफी काम करने की जरूरत है. अगर सरकारी दस्तावेजों को ही देखें और गुजरात के प्रमुख शहरों में जाएं तो पता चलता है कि राज्य में समृद्धि सड़कों, फ्लाइओवरों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के मामले में आई है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि अस्थायी ग्रामीण मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में देश के 20 बड़े राज्यों में गुजरात 14वें स्थान पर है. अस्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात सातवें स्थान पर है. स्थायी ग्रामीण मजदूरों और स्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात क्रमशः 17वें और 18वें स्थान पर है. इसका मतलब यह है कि गुजरात में मजदूरों की हालत बुरी है. उनकी आमदनी कम होने की वजह से उनकी क्रय शक्ति कम है. अध्ययन बताते हैं कि ऐसे परिवारों में कुपोषण और अशिक्षा जैसी स्थितियां सामान्य होती हैं. सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि शिशु मृत्यु दर के मामले में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों में गुजरात सातवें स्थान पर है. अब भी यहां प्रति हजार नवजात बच्चों में से 50 काल के गाल में समा रहे हैं. औसत उम्र के मामले में गुजरात आठवें स्थान पर है. मातृ मृत्यु दर के मामले में भी प्रदेश आठवें स्थान पर है. लिंग अनुपात के मामले में भी गुजरात आठवें स्थान पर है और यहां 1000 पुरुषों की तुलना में 886 महिलाएं ही हैं. गुजरात के शहरी इलाकों में जहां सबसे अधिक विकास की बात मोदी सरकार करती है, वहां यह औसत घटकर 856 पर पहुंच जाता है. चार साल से कम उम्र के बच्चों के आयु वर्ग में यह औसत घटकर 841 पर पहुंच जाता है. पहली से दसवीं कक्षा के बीच पढ़ाई छोड़ने के मामले में गुजरात का औसत 59.11 फीसदी है. यह 56.81 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही बुरा है लेकिन इस मामले में 13 राज्यों का प्रदर्शन गुजरात से अच्छा है. घरों में पानी की आपूर्ति के मामले में गुजरात देश के सभी राज्यों में 14 वें स्थान पर है. यहां के 58 फीसदी घरों में ही नल के जरिए पानी पहुंचता है.
लेकिन इन तथ्यों के उलट मोदी देश भर में ऐसा माहौल बनाने में कामयाब रहे हैं कि उन्होंने गुजरात का खासा विकास किया है और विकास का अगर कोई माॅडल पूरे देश के लिए हो सकता है तो वह है गुजरात माॅडल. मोदी के मुताबिक सारी समस्याओं का समाधान विकास के गुजरात माॅडल में है.
जानकार मानते हैं कि मोदी को बड़ा बनाने में कहीं न कहीं विपक्ष की भी अपनी भूमिका रही है. विपक्ष न तो गुजरात और न ही गुजरात के बाहर मोदी की नाकामियों को सही ढंग से रखने में सफल हुआ है. वहीं मनमोहन सिंह एक ऐसे कमजोर प्रधानमंत्री रहे हैं कि इससे पैदा हुई रिक्तता में मोदी काफी बड़े लगने लगते हैं और इसी में वे खुद यह भूल जाते हैं कि वे भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार मात्र हैं न कि प्रधानमंत्री.
Tuesday, 11 March 2014
भारतीय जनता पार्टी हमेशा दलित विरोधी रही है ।
भारतीय जनता पार्टी बनाने का मकसद सिर्फ दलितों को सत्ता में आने से रोकने का रहा है ।
एक शोध से ये तथ्य सामने आए हैं कि गुजरात में 1 मार्च 2002 से 4 जून 2002 के दौरान हुई गिरफ्तारियों में 2,945 लोग अमदाबाद के तैंतीस थाना क्षेत्रों से थे. इनमें जिन 1577 हिंदुओं को गिरफ्तार बताया गया उनमें 747 केवल अनुसूचित जाति के थे और पिछड़ों की तादाद 797 थी. ब्राह्मण और बनिया केवल दो-दो और पटेल जाति के उन्नीस लोग थे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों और संस्थाओं और उनकी बनाई पार्टी भारतीय जनता पार्टी (पूर्व में जनसंघ) के इतिहास की जो थोड़ी भी जानकारी रखते हैं, वे जानते हैं कि उनकी दलितों समेत पिछड़ी जातियों को दिए जाने वाले संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ उन्मादी कार्रवाइयां हर मौके पर देखी गई हैं. अस्सी के दशक में गुजरात में दो बार आरक्षण-विरोधी उग्र आंदोलन हुए और मतदाताओं द्वारा चुनी गई सरकार को दो बार आसानी से पराजित किया गया.
बिहार में कर्पूरी ठाकुर के शासनकाल में 1978 में मुंगेरीलाल आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग को दिए गए आरक्षण का जबर्दस्त विरोध जनता पार्टी के घटक के रूप में जनसंघ ने किया और सरकार गिरा दी. उत्तर प्रदेश में भी इसे दोहराया गया. कर्पूरी ठाकुर को हटा कर एक दलित जाति के रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बना कर आरक्षण-विरोधी सरकार बनाई गई. संसदीय राजनीति का इतिहास बताता है कि पिछड़ों के बीच जातिवाद और पिछड़ा बनाम दलित की एक रेखा खींचने में मुख्यत: सवर्ण आधार वाली पार्टियों को महारत हासिल रही है.
पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी वाली पिछड़ी जातियों को विशेष अवसर देने का जब कभी प्रयास किया गया तो उसके विरोध के लिए हिंदुत्व का ही सहारा लिया गया और मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववाद के हमले तेज हुए. अस्सी के दशक में गुजरात से लेकर बिहार के जमशेदपुर दंगे को इस सिलसिले में याद किया जा सकता है. पिछड़ों को आरक्षण देने के फैसलों और अल्पसंख्यक-विरोधीहमलों का एक सीधा संबंध है. 1990 के दशक में भी केंद्रीय सेवाओं में वीपी मंडल आयोग की अनुंशसाओं के अनुसार पिछड़ी जातियों को सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला हुआ तो लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या तक की रथयात्रा निकाली और विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया.
आरक्षण-विरोध के दौरान जो उग्रता पैदा हुई उसे 1980 के दशक में राम मंदिर अभियान की तरफ मोड़ा गया और उसे संचालित करने के लिए संघ ने कई नए संगठन बनाए. 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में हिंसक आरक्षण-विरोध और रथयात्रा के उन्मादी माहौल में मुसलमानों के खिलाफ देश भर में हमले हुए. संघ के निर्माण के इतिहास पर नजर डालें तो वह दलितों के राजनीतिक उभार की प्रतिक्रिया में ही बना था. महाराष्ट्र में डॉ भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में हुए दलित आंदोलन की प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र के कट््टरपंथी ब्राह्मणों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी ।
भारतीय जनता पार्टी में केवल वही दलित और मुस्लिम देखने को मिलेंगे जो अपने निजी स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं ।