इतिहास में एक परम्परा रही है कि किसी भी व्यक्तित्व को समझने के लिए ‘उसी जैसा’ व्यक्ति इतिहास की गर्त में खंघाला जाता है, इतिहास के विद्यार्थियों के पास ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब वह किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को समझने के लिए अतीत की धारा में आगे-पीछे होते हैं। कभी किसी को ‘कश्मीर का अकबर’ तो कभी किसी को ‘भारत का नेपोलियन’ कह कर उसे आंकता है। अभी हाल में ही भारत में तमाम लोगों ने अन्ना हजारे को गांधी के सापेक्ष करके अतीत को खंघाला। खैर अभी हाल में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी को हिटलर कह कर हमें फिर से अतीत की धारा में पीछे जाने के लिए विवश किया है। पूरी भारतीय राजनीति में हिटलर (जर्मनी का) फिर से चर्चा में है- आखिर कौन है ये हिटलर? नरेन्द्र मोदी से उसका क्या रिश्ता है? मोदी जिस संघ परिवार में खेल-कूद कर बड़े हुए हैं क्या उसकी विचारधारा से हिटलर जुड़ा हुआ है? ये सारे सवाल आज राजनैतिक विश्लेषकों और मीडिया द्वारा उछाले जा रहे हैं।
हमें नरेन्द्र मोदी को समझने के लिए अतीत की धारा में लौटाना होगा- आॅस्ट्रिया के एक छोटे से शहर ब्रानों में, जहाँ 20 अप्रैल 1889 को हिटलर ने एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लिया, एक सैनिक के तौर पर हिटलर ने अपना जीवन शुरू किया परन्तु बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती गयी और अपनी जालसाजी और कुटिलता के चलते हिटलर जर्मनी का फ्यूहरर (प्रधान नेता) बन बैठा। इसी क्रम में हिटलर ने राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन श्रम दल (नात्सीदल) के अध्यक्ष डेªक्सलर को भी अपने रास्ते से हटा दिया। इसी क्रम में यदि मोदी को देखा जाए तो हम आसानी से देख सकते हैं कि किस तरह नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए भाजपा के संस्थापक सदस्यों को ही अपने रास्ते से हटा दिया। लालकृष्ण आडवाणी सरीखे नेता जो भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ थे को भी नहीं बक्शा। इस क्रम में जसवंत सिंह, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, लाल जी टंडन जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी संघ परिवार के साथ मिलकर अपने रास्ते से लगभग हटा ही दिया है। ये नेता आज अपनी सीटों से बेदखल होकर अपनी स्वयं की जीत-हार में ही परेशान हैं।
हिटलर ने तात्कालीन जर्मनी के आर्थिक हालात का बड़ी चतुराई के साथ लाभ उठाया था। 1929 में आयी महा आर्थिक मंदी ने जर्मनी की व्यवस्था को चैपट कर दिया था। उस समय जर्मनी की सड़कों पर बड़ी संख्या में बेरोजगार गले में तख्ती लटकाये- ‘मैं कोई भी काम करने को तैयार हूँ’ दिखायी देने लगे थे। पूँजीपतियों को भय सताने लगा था कि कहीं जर्मनी में साम्यवादी क्रान्ति न हो जाये। आज भारत भी आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लूट-खसोट की नीतियों से पीडि़त है। अर्थव्यवस्था के हालात ठीक नहीं हैं, वस्तुतः इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब फासिस्ट संगठन अपना प्रभाव बढ़ाते हैं तो पूंजीपति वर्ग उनके साथ जुड़ जाता है। आज जब नरेन्द्र मोदी अम्बानी और आडानी के पैसों से उड़नखटोले में उड़ कर विकास का जुमला उछाल रहे हैं तो अनायास ही हिटलर के साथ जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बन्धों की यादें ताजा नहीं हो रही हैं। यहाँ जर्मनी के इतिहास के पन्नों को पलटना बेहद उपयोगी होगा क्योंकि प्रश्न हिटलर और जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बंधों अथवा मोदी और अम्बानी के सम्बंधों का नहीं है बल्कि इसका है कि इन सम्बन्धों के चलते मनुष्यता को कैसे-कैसे दुख झेलने पड़ते हैं।
हिटलर के पतन के बाद न्यूरेमबर्ग में नाजियों के खिलाफ मुकदमा चला, जिसमें बाल्थर फंक नामक का एक व्यक्ति भी था जो जर्मनी के प्रसिद्ध आर्थिक अखबार ‘बर्लिनर वोरसेन जेतुंग’ का सम्पादक था और पूंजीपतियों और हिटलर के बीच का महत्वपूर्ण कड़ी भी। उसने कई रहस्यों को उजागर किया जिससे हिटलर और पूंजीपतियों का संबंध उजागर हुआ। हिटलर ने कोयला खानों के मालिकों से पैसे वसूलने के लिए ‘सर ट्रेजरी’ नाम से एक फण्ड भी बनाया था। फंक ने एक लम्बी लिस्ट बतायी जिसमें काॅर्टन आई.जी. फाखेन, वान स्निजलर, अगस्त दिहन, जैसे उद्योगपति थे जो हिटलर को अपने स्वार्थों के लिए चंदा देते थे। आज भारत में खास कर के गुजरात में मोदी ने अडानी को 1 रू0 प्रति वर्गफुट से हिसाब से जमीने दी हैं, से साफ जाहिर है कि आडानी और अम्बानी मोदी को किस लिए पैसे दे रहे हैं? क्यों भारत के दो-तिहाई पूंजीपति मोदी को बतौर प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं?
हिटलर ने अपना प्रचार करवाने के लिए एक पोस्टर जारी किया था- जिसमें सिर्फ हिटलर का एक फोटो था। यानि नाजीवादी पार्टी के अन्य नेताओं ने हिटलर के समक्ष समर्पण कर दिया था। भारत के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम हैं जब एक व्यक्ति ने पूरी पार्टी को हाइजैक कर लिया हो- तभी तो आज ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा उछाला जा रहा है। भारत के इतिहास में कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने के लिए शायद ही इतना उतावला या हड़बड़ी में रहा हो जैसा मोदी दिख रहे हैं। संसदीय गरिमा को ताक पर रखकर ‘प्रेसीडेन्सियल फोबिया’ से ग्रसित मोदी ‘प्रधानमंत्री पद को सर्कस के जोकर का पद बना दिया है ।
बचपन मे मुझे मेरे शिक्षक ने बताया कि लिखने से याद्दाश्त मजबूत होती है तब से लेखन का सिलसिला जारी है
Friday, 11 April 2014
कल का हिटलर आज का मोदी
Saturday, 5 April 2014
कोबरा स्टिंग ऑपरेशन जन्मभूमि ( बाबरी मस्जिद विध्वंस)
कोबरापोस्ट ने ऑपरेशन जन्मभूमि के तहत बाबरी मस्जिद के बारे में बीजेपी की हिकमते अमली के रा़ज पर से पर्दा उठाते हुए सनसनीखेज खुलासा किया है कि मस्जिद को गिराने की जानकारी न सिर्फ कई बीजेपी लीडरों को थी, बल्कि इसके लिए कारसेवकों को तरबियत दी गयी थी।
कोबरपोस्ट का दावा है कि इस झगड़े की बुनियाद मे 1949 की एक घटना है, जब रामलला की मूर्ति को गुपचुप तरीके से बाबरी मस्जिद मे रखा दिया गया था। इस वाकिये के चश्मदीद गवाह कोई और नहीं, बल्कि राम जन्मभूमि तहरीक में अहम रोल निभाने वाले बी एल शर्मा प्रेम हैं। कोबरा पोस्ट ने 23 लीडरों को स्टिंग का वीडियो जारी किया है।
शर्मा का कहना है कि वो तब अयोध्या मे मिलिट्री पुलिस मे एक वारंट आफिसर के रूप मे तैनात थे। यह सब उनकी आंखों के सामने हुआ। तब अयोध्या के पुजारी रामचंद्र दास उनकी यूनिट मे बराबर आया जाया करते थे। एक दिन राम चन्द्र दास ने उन्हे बताया कि रामलला अमुक दिन ऐसे प्रकट होंगे, तो वहां अपने साथियों को लेकर आना। कोबरा ने दावा किया है कि उस दिन अयोध्या में जो कुछ हुआ, उसकी जानकारी लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह समेत नरसिंह राव को भी थी।
कोबरापोस्ट का दावा है कि बाबरी मस्जिद को गिराने का साजिश विश्व हिन्दू परिषद और शिव सेना ने अलग अलग रची थी। इन दोनों संगठनो ने 6 दिसंबर से काफी पहले प्लान के तहत अपने कारकुनों को इस मकसद के लिए ट्रेनिंग दी थी। आरएसएस के तरबियत याफ्ता काकारकुनों का एक दस्ता भी बनाया गया था, जिसको बलिदानी जत्था भी कहा गया।
विहिप की युवा इकाई बजरंग दल के कारकुनों ने गुजरात के सरखेज मे इस मकसद के लिए एक महीने की तरबिय़त हासिल की। दूसरी ओर शिवसेना ने भी अपने कारकुनों के लिए ऐसा ही एक तरबिय़त कैंप भिंड-मुरैना मे लगाया था। इस मे लोगों को पहाड़ियों पर चढ़ने और खुदाई करने की तरबिय़त दी गयी थी।
6 दिसंबर को मस्जिद को तोड़ने के मकसद से छैनी, घन, गैंती, फावडा, सब्बल और दूसरी तरह के औजारों को खासी तादाद मे जुटा लिया गया था।
राम कथा मंच एक क़सम भी दिलायी गयी थी, उस वक़्त आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर और आचार्य धर्मेंद्र सहित कई जाने माने लीड़र और संत लोग थे। इसके फौरी बाद बाबरी मस्जिद को तोड़ने का काम शुरू कर दिया गया था।
वीएचपी के नेताओं ने बाबरी तो़डने के मकसद से कुछ दिन पहले अलग अलग जगहों पर 1200 संघ कार्यकर्ताओं को मिला कर एक सेना का कियाम किया था। इस गुप्त सेना का नाम लक्ष्मण सेना था। इस सेना को सभी सामान मुहय्या कराने और उनकी रहनुमाई का जिम्मा राम गुप्ता को सौपा गया था। इस सेना का नारा जय शेशावतार था।
दूसरी जानिब शिवसेना ने भी इसी तर्ज पर अयोध्या मे अपने मुक़ामी कारकुनों की एक सेना बना रखी थी। इसका नाम प्रताप सेना था। इसी सेना ने शिवसेना के बाबरी मस्जिद गिराने के लिए जरूरी सामान और मदद मुहय्या कराई थी। आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल के नेता के लीडरों के अलावा बाल ठाकरे और राज ठाकरे को भी इन सरगर्मियों की जानकारी थी और वे राब्ते में थे।
Muslims of Gujarat During Modi ,s Government
अगर हम 2002 के गुजरात जनसंहार को भूल भी जायें तो भी आतंकवाद के दमन के नाम पर सिलसिलेवार ढंग से हो रही फर्जी मुठभेड़ो में मुसलमानों की हत्या को हम कैसे भुला पाएंगे। कुछ देर के लिए अगर हम इन क़ानूनी हत्यारों को भी भूल जाएँ और प्रदेश में पिछले 10 वर्षों के दौरान मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक विकास पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि मोदी सरकार ने गुजरात के मुसलमानों के साथ किस प्रकार की भेदभाव की नीति को सुविचारित ढंग से आपनाया है।
गुजरात में मुसलमानों की जनसंख्या गुजरात की कुल जनसंख्या का 9.7% है पर वर्तमान सरकार द्वारा पिछले एक दशक में चलाये गए SJSRY और NSAP योजना को छोड़कर ज्यादातर योजनाओं में मुसलमानों की भागीदारी उनके जनसंख्या के अनुपात से कम ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 178)। उदहारण के तौर पर कृषि बीमा योजना में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 3.5% है, जबकि पॉवर टिलर आवंटन के मामले में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 1.4% और ट्रेक्टर के मामले में 4.1% है। गुजरात में मोदी के शासन काल में सहकारी बैंक या ग्रामीण विकास बैंक से वहां के मुसलमानों को किसी प्रकार का कोई कर्ज नहीं मिला है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-75)।
बचत और क्रेडिट सोसाइटी बनाने और छोटे उद्योग लगाने के मामले में गुजरात के मुस्लिम वहां के हिन्दुओं से दोगुने आगे हैं लेकिन इस सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता और प्रशिक्षण का लाभ देने में हिन्दुओं को कहीं अधिक महत्व दिया जाता है। गुजरात में दिए गए कुल प्रशिक्षण का लाभ उठाने में वहां के मुसलमानों की भागीदारी मात्र 5.5% ही है जबकि उद्योग लगाने के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले भवनों में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 4.5% ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-5)। गुजरात के विभिन्न बैंक में खुले कुल खातो में से मुसलमानों की हिस्सेदारी 12% है जबकि प्रदेश में बैंक द्वारा वितरित किये गए कुल कर्जो में मुसलमानों की हिस्सेदारी मात्र 2.6% है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 127)। गुजरात का प्रत्येक मुसलमान वहां के बैंक में प्रति हिन्दू द्वारा जमा किये गए धन से 20% अधिक पैसे जमा करता है और इसके बावजूद कर्ज देने के मामले में मुसलमानों को हिन्दुओं की तुलना में कम महत्व दिया जाता है।
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) योजना के तहत 2000-01 और 2005-06 के दौरान गुजरात सरकार द्वारा दिए गए कुल 3133.77 करोड़ के कर्जो में से मुसलमानों को मात्र 0.44 करोड़ दिया गया। इसी प्रकार नाबार्ड द्वारा कर्जों की पुनर्वित्त में मुसलमानों को 1.76% ही हिस्सा दिया गया (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 351-53)।
2004-05 में गुजरात में 41% मुसलमान सेवा क्षेत्र में नौकरी करते थे जो कि 2009-10 में घटकर 31.7% रह गया। उसी प्रकार 2004-05 में 59% मुसलमान स्वरोज़गार करते थे जो कि 2009-10 घटकर 53%रह गया। इसी काल के दौरान मुसलमानों कि वेतनभोगी नौकरियों में भागीदारी 17.5%से घटकर 14% हो गई। यह भी गौर करने वाली बात है कि गुजरात में अनियमित मजदूरी कि कुल भागीदारी में मुसलमानों का हिस्सा इसी कालावधि के दौरान 23% से बढ़कर 32% हो गया है। इसका मतलब तो यही है कि मोदी के शासनकाल के दौरान गुजरात में मुसलमानों को निम्न दर्जे के रोजगारों की ओर धकेला जा रहा है। 2001 में जब गुजरात कि कुल साक्षरता दर 69.1% थी तब वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 73.5% थी जबकि 2007-08 में जब गुजरात की कुल साक्षरता दर 74.9% हो गई तब भी वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 74.3% है। 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों द्वारा किसी प्रकार के शैक्षणिक संस्थानों में नामांकित होने के मामले में गुजरात के हिन्दू और मुस्लिम समाज में औसत अंतर राष्ट्रीय औसत से कम है (अतुल सूद, पृ.स. 270, तालिका 9.9)। क्या इन सब के पीछे गुजरात सरकार के द्वारा मुसलमानों के साथ किये जाने वाले भेदभाव की नीति जिम्मेदार नहीं है?
मोदी जी गुजरात में मुसलमानों में शिक्षा के प्रति रुझान में आई कमी के लिए मदरसा को भी दोषी नहीं ठहरा सकते है क्योंकि पूरे भारत में गुजरात ही एक ऐसा प्रदेश है जहाँ मदरसा सबसे कम प्रचलित है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 293)।
लाँकि गुजरात के मुसलमानों की यह स्थिति हमेशा ऐसी ही नहीं थी। 1999-2000 में गुजरात में मुसलमानों में स्वरोजगार गुजरात के हिन्दू समुदाय से अधिक थी लेकिन 2009-10 आते-आते स्थिति बिलकुल ही विपरीत हो गई है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 343)। दूसरी तरफ यदि हम ग्रामीण मजदूरों में मुसलमानों की भागीदारी को देखें तो ये पता चलता है कि 1999-2000 में मुसलमानों की इस क्षेत्र में भागीदारी हिन्दुओं से कम थी जो की आज बिलकुल उल्टा हो गया है। निष्कर्ष साफ़ है, गुजरात के मुसलमानों को मजबूरन रोजगार के लिए स्वरोजगार, व्यापर और विनिर्माण जैसे अच्छे रोजगारों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी का काम करने को मजबूर हैं ।
आखिर विकास हो कहाँ रहा है मंगल ग्रह पर?