Saturday, 5 April 2014

Muslims of Gujarat During Modi ,s Government

अगर हम 2002 के गुजरात जनसंहार को भूल भी जायें तो भी आतंकवाद के दमन के नाम पर सिलसिलेवार ढंग से हो रही फर्जी मुठभेड़ो में मुसलमानों की हत्या को हम कैसे भुला पाएंगे। कुछ देर के लिए अगर हम इन क़ानूनी हत्यारों को भी भूल जाएँ और प्रदेश में पिछले 10 वर्षों के दौरान मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक विकास पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि मोदी सरकार ने गुजरात के मुसलमानों के साथ किस प्रकार की भेदभाव की नीति को सुविचारित ढंग से आपनाया है।

गुजरात में मुसलमानों की जनसंख्या गुजरात की कुल जनसंख्या का 9.7% है पर वर्तमान सरकार द्वारा पिछले एक दशक में चलाये गए SJSRY और NSAP योजना को छोड़कर ज्यादातर योजनाओं में मुसलमानों की भागीदारी उनके जनसंख्या के अनुपात से कम ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 178)। उदहारण के तौर पर कृषि बीमा योजना में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 3.5% है, जबकि पॉवर टिलर आवंटन के मामले में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 1.4% और ट्रेक्टर के मामले में 4.1% है। गुजरात में मोदी के शासन काल में सहकारी बैंक या ग्रामीण विकास बैंक से वहां के मुसलमानों को किसी प्रकार का कोई कर्ज नहीं मिला है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-75)।

बचत और क्रेडिट सोसाइटी बनाने और छोटे उद्योग लगाने के मामले में गुजरात के मुस्लिम वहां के हिन्दुओं से दोगुने आगे हैं लेकिन इस सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता और प्रशिक्षण का लाभ देने में हिन्दुओं को कहीं अधिक महत्व दिया जाता है। गुजरात में दिए गए कुल प्रशिक्षण का लाभ उठाने में वहां के मुसलमानों की भागीदारी मात्र 5.5% ही है जबकि उद्योग लगाने के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले भवनों में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 4.5% ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-5)। गुजरात के विभिन्न बैंक में खुले कुल खातो में से मुसलमानों की हिस्सेदारी 12% है जबकि प्रदेश में बैंक द्वारा वितरित किये गए कुल कर्जो में मुसलमानों की हिस्सेदारी मात्र 2.6% है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 127)। गुजरात का प्रत्येक मुसलमान वहां के बैंक में प्रति हिन्दू द्वारा जमा किये गए धन से 20% अधिक पैसे जमा करता है और इसके बावजूद कर्ज देने के मामले में मुसलमानों को हिन्दुओं की तुलना में कम महत्व दिया जाता है।

भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) योजना के तहत 2000-01 और 2005-06 के दौरान गुजरात सरकार द्वारा दिए गए कुल 3133.77 करोड़ के कर्जो में से मुसलमानों को मात्र 0.44 करोड़ दिया गया। इसी प्रकार नाबार्ड द्वारा कर्जों की पुनर्वित्त में मुसलमानों को 1.76% ही हिस्सा दिया गया (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 351-53)।

2004-05 में गुजरात में 41% मुसलमान सेवा क्षेत्र में नौकरी करते थे जो कि 2009-10 में घटकर 31.7% रह गया। उसी प्रकार 2004-05 में 59% मुसलमान स्वरोज़गार करते थे जो कि 2009-10 घटकर 53%रह गया। इसी काल के दौरान मुसलमानों कि वेतनभोगी नौकरियों में भागीदारी 17.5%से घटकर 14% हो गई। यह भी गौर करने वाली बात है कि गुजरात में अनियमित मजदूरी कि कुल भागीदारी में मुसलमानों का हिस्सा इसी कालावधि के दौरान 23% से बढ़कर 32% हो गया है। इसका मतलब तो यही है कि मोदी के शासनकाल के दौरान गुजरात में मुसलमानों को निम्न दर्जे के रोजगारों की ओर धकेला जा रहा है। 2001 में जब गुजरात कि कुल साक्षरता दर 69.1% थी तब वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 73.5% थी जबकि 2007-08 में जब गुजरात की कुल साक्षरता दर 74.9% हो गई तब भी वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 74.3% है। 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों द्वारा किसी प्रकार के शैक्षणिक संस्थानों में नामांकित होने के मामले में गुजरात के हिन्दू और मुस्लिम समाज में औसत अंतर राष्ट्रीय औसत से कम है (अतुल सूद, पृ.स. 270, तालिका  9.9)। क्या इन सब के पीछे गुजरात सरकार के द्वारा मुसलमानों के साथ किये जाने वाले भेदभाव की नीति जिम्मेदार नहीं है?

मोदी जी गुजरात में मुसलमानों में शिक्षा के प्रति रुझान में आई कमी के लिए मदरसा को भी दोषी नहीं ठहरा सकते है क्योंकि पूरे भारत में गुजरात ही एक ऐसा प्रदेश है जहाँ मदरसा सबसे कम प्रचलित है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 293)।

लाँकि गुजरात के मुसलमानों की यह स्थिति हमेशा ऐसी ही नहीं थी। 1999-2000 में गुजरात में मुसलमानों में स्वरोजगार गुजरात के हिन्दू समुदाय से अधिक थी लेकिन 2009-10 आते-आते स्थिति बिलकुल ही विपरीत हो गई है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 343)। दूसरी तरफ यदि हम ग्रामीण मजदूरों में मुसलमानों की भागीदारी को देखें तो ये पता चलता है कि 1999-2000 में मुसलमानों की इस क्षेत्र में भागीदारी हिन्दुओं से कम थी जो की आज बिलकुल उल्टा हो गया है। निष्कर्ष साफ़ है, गुजरात के मुसलमानों को मजबूरन रोजगार के लिए स्वरोजगार, व्यापर और विनिर्माण जैसे अच्छे रोजगारों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी का काम करने को मजबूर हैं ।
आखिर विकास हो कहाँ रहा है मंगल ग्रह पर?

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