पिछले डेढ़-दो साल में नरेंद्र मोदी की गतिविधियों को देखें तो साफ दिखता है कि वे अभी से ही खुद को प्रधानमंत्री मानकर चल रहे हैं. जो लोग राजनीति को देखते-समझते रहे हैं, उनका मानना है कि प्रधानमंत्री बनने के लिए जितनी व्यग्रता नरेंद्र मोदी दिखा रहे हैं उतनी शायद ही किसी ने दिखाई हो. वे खुद को प्रधानमंत्री मानकर चल रहे हैं. उन्हें मिलने वाले ज्ञापनों को इस तरह से प्रचारित-प्रसारित किया जाता है जैसे वे ज्ञापन प्रधानमंत्री को ही मिले हों. जिस तरह से मोदी पूरे देश के लोगों से जुड़ने की व्यग्रता में सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की उनकी बेचैनी दिखती है. वे मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते. उनके निशाने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी खास तौर पर रहते हैं. शायद ही नरेंद्र मोदी की कोई ऐसी सभा होती है जब वे इन तीनों का मजाक नहीं उड़ाते.
प्रधानमंत्री बनने की इच्छा मन में लिए नरेंद्र मोदी दावा करते हैं कि वे पूरे भारत को गुजरात की तरह विकसित बनाना चाहते हैं. लेकिन इस दावे के बीच वे गुजरात के स्याह पक्ष को भूल जाते हैं, जिसे सुधारने के लिए अभी उन्हें अपने राज्य में ही काफी काम करने की जरूरत है. अगर सरकारी दस्तावेजों को ही देखें और गुजरात के प्रमुख शहरों में जाएं तो पता चलता है कि राज्य में समृद्धि सड़कों, फ्लाइओवरों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के मामले में आई है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि अस्थायी ग्रामीण मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में देश के 20 बड़े राज्यों में गुजरात 14वें स्थान पर है. अस्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात सातवें स्थान पर है. स्थायी ग्रामीण मजदूरों और स्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात क्रमशः 17वें और 18वें स्थान पर है. इसका मतलब यह है कि गुजरात में मजदूरों की हालत बुरी है. उनकी आमदनी कम होने की वजह से उनकी क्रय शक्ति कम है. अध्ययन बताते हैं कि ऐसे परिवारों में कुपोषण और अशिक्षा जैसी स्थितियां सामान्य होती हैं. सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि शिशु मृत्यु दर के मामले में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों में गुजरात सातवें स्थान पर है. अब भी यहां प्रति हजार नवजात बच्चों में से 50 काल के गाल में समा रहे हैं. औसत उम्र के मामले में गुजरात आठवें स्थान पर है. मातृ मृत्यु दर के मामले में भी प्रदेश आठवें स्थान पर है. लिंग अनुपात के मामले में भी गुजरात आठवें स्थान पर है और यहां 1000 पुरुषों की तुलना में 886 महिलाएं ही हैं. गुजरात के शहरी इलाकों में जहां सबसे अधिक विकास की बात मोदी सरकार करती है, वहां यह औसत घटकर 856 पर पहुंच जाता है. चार साल से कम उम्र के बच्चों के आयु वर्ग में यह औसत घटकर 841 पर पहुंच जाता है. पहली से दसवीं कक्षा के बीच पढ़ाई छोड़ने के मामले में गुजरात का औसत 59.11 फीसदी है. यह 56.81 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही बुरा है लेकिन इस मामले में 13 राज्यों का प्रदर्शन गुजरात से अच्छा है. घरों में पानी की आपूर्ति के मामले में गुजरात देश के सभी राज्यों में 14 वें स्थान पर है. यहां के 58 फीसदी घरों में ही नल के जरिए पानी पहुंचता है.
लेकिन इन तथ्यों के उलट मोदी देश भर में ऐसा माहौल बनाने में कामयाब रहे हैं कि उन्होंने गुजरात का खासा विकास किया है और विकास का अगर कोई माॅडल पूरे देश के लिए हो सकता है तो वह है गुजरात माॅडल. मोदी के मुताबिक सारी समस्याओं का समाधान विकास के गुजरात माॅडल में है.
जानकार मानते हैं कि मोदी को बड़ा बनाने में कहीं न कहीं विपक्ष की भी अपनी भूमिका रही है. विपक्ष न तो गुजरात और न ही गुजरात के बाहर मोदी की नाकामियों को सही ढंग से रखने में सफल हुआ है. वहीं मनमोहन सिंह एक ऐसे कमजोर प्रधानमंत्री रहे हैं कि इससे पैदा हुई रिक्तता में मोदी काफी बड़े लगने लगते हैं और इसी में वे खुद यह भूल जाते हैं कि वे भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार मात्र हैं न कि प्रधानमंत्री.
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