Sunday, 2 March 2014

अशोक सिंघल जी कहते हैं कि हिन्दु कम से कम पांच बच्चे पैदा करे । अशोक सिंघल का फतवा महिलाओं के लिए कलंक

पांच पांडवों ने सौ कौरवों को हरा दिया. हिन्दुस्तान में लेकिन हिन्दुओं को किससे लड़ना है? मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन वगैरह हिन्दुओं से संख्या बल में बहुत कम हैं.

विश्व हिन्दू परिषद के कर्ताधर्ता और राजनीति में तरह तरह की हिन्दू-कलह के आविष्कारक अशोक सिंघल ने नया शिगूफा छेड़ा है. उनके अनुसार भारत में हिन्दुओं की घटती जनसंख्या को देखते हुए प्रत्येक हिन्दू दंपत्ति को कम से कम पांच बच्चे पैदा करने चाहिए.
यह घातक फासिस्टी और असंवैधानिक सलाह इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर दी गई है. दुनिया बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए तरह तरह के प्रतिबंधात्मक उपायों को लेकर सोच रही है. आपातकाल में जबरिया नसबंदी के आरोप के कारण कांग्रेस को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था. अशोक सिंघल अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंस, समान नागरिक संहिता और मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करने जैसे विवादों को लेकर संपूर्ण कटुता के साथ मुखर रहते हैं. बीच बीच में अयोध्या में पंचकोशी परिक्रमा करने जैसे धार्मिक आविष्कार और उसके वोट बैंक में तब्दील होने के समीकरणों की अनदेखी भी वे नहीं करते.
उनके नए सुझाव के कई संदर्भ हैं. एक तो यह कि क्या मनुष्यों की अंकगणित के आधार पर किसी राष्ट्र या राज्य का संचालन निर्भर है. यदि ऐसा ही है तो मुट्ठी भर अंगरेज़ किस तरह पौने दो सौ बरस हिन्दुस्तान पर हुकूमत कर सके.
कभी वक्त था जब अंगरेज़ी राज्य का सूरज धरती पर अस्त नहीं होता था. दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड वगैरह पर कब्ज़ा कर अंगरेज़ों की संततियां वहां नैचुरलाइज़ हो गई है. आज भी अंगरेज दुनिया की मालिक सभ्यता के पुरखे बने हुए हैं. चीन संसार में आबादी के लिहाज़ से भारत से पिछड़ने की स्थिति में है. फिर भी सिंघल हैं कि हिन्दुओं के लिए नया सांस्कृतिक राष्ट्रवाद खोज रहे हैं.
पांच का दिलचस्प आंकड़ा महाभारत के पांडवों की संख्या को ध्यान में रखकर सिंघल को ऐतिहासिक कारणों से सूझा होगा. पांच पांडवों ने सौ कौरवों को हरा दिया. हिन्दुस्तान में लेकिन हिन्दुओं को किससे लड़ना है? मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन वगैरह हिन्दुओं से संख्या बल में बहुत कम हैं.
देश में सवा सौ करोड़ की आबादी है. फिर भी अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री, अल्पसंख्यक यू.पी.ए. अध्यक्ष और अल्पसंख्यक उपराष्ट्रपति बहुसंख्यकों के साथ जनतांत्रिक संतुलन में हैं. भारत की सेना, पुलिस, राजनीति, नौकरशाही और नक्सलवाद, न्यायपालिका और कार्यपालिका वगैरह में निश्चित तौर पर हिन्दुओं का बहुमत है. आतंकवादी अलबत्ता मुसलमानों में हो सकते हैं. लेकिन परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद, मौलाना आज़ाद, सैम मानेक शॉ, डा0 अब्दुल कलाम, हामिद अन्सारी, रहीम, कबीर, जायसी, मदर टेरेसा, मैडम कामा, डा0 अम्बेडकर, भगतसिंह, फीरोज़ गांधी, दीनबंधु एन्ड्रूज़, अशफाकुल्ला वगैरह की जातियां इतिहास को ही याद नहीं रहतीं. बेचारे सिंघल क्या तय करना चाहते हैं?
यक्ष प्रश्न तो यह है कि विश्व हिन्दू परिषद के सरगना ने हिन्दू स्त्रियों को बंधुआ मज़दूर की तरह क्यों समझ लिया है. पुरुषों का यह कबीलाई अधिकार कहां से आ गया कि वे खाप पंचायतों की तर्ज़ पर अपनी पत्नियों को संतान उत्पत्ति करने की मशीन बना दें. हर स्त्री के किन कारणों, परिस्थितियों और आवश्यकताओं के चलते कम से कम पांच बच्चे क्यों पैदा किए ही जाएं.
हिन्दू स्त्रियों ने आबादी बढ़ाने के लिए न तो आंदोलन किए हैं. न ही ऐसे आंदोलन करने की कभी स्थिति बन सकती है. पुरुष प्रधान समाज में हर तबके की स्त्री को भोग्य वस्तु बनाकर रखा जाने का विचार अपने आप में वहशी है.
उच्च मध्यवर्ग के पुरुष भी केवल सुविधाजनक जगहों पर पत्नियों को साथ ले जाते हैं. अनेक ऐसे तबके हैं जिनमें शराब और जुए आदि की लत के कारण आततायी पुरुष अपनी स्त्रियों की निर्ममतापूर्वक पिटाई करते हैं. इस देश में परित्यक्ताओं, विधवाओं और पुरुषों द्वारा तरह तरह से सताई जा रही मुसीबतजदा औरतों की संख्या करोड़ों में होगी.

सिंघल का फतवा महिलाओं के लिए एक नए कलंक का प्रमाणपत्र है.

No comments:

Post a Comment