सोलहवीं लोकसभा के लिए मतदान की तारीखें घोषित हो चुकी हैं। हर अवसर को अपने हिसाब से भुनाने में माहिर हमारे राजनेता नए आवरण धारण कर मतदाता से रूबरू हैं। पुराने आश्वासनों को नए शब्द दे दिए गए हैं और हर पार्टी लगभग एक-सा राग अलाप रही है। सबके निशाने पर भ्रष्टाचार है, सबको राष्ट्रीय स्वाभिमान की चिंता है और हरेक का जोर सिर्फ आर्थिक सुधार पर है। इनमें से कौन सच्चा है, कौन झूठा? कहीं ऐसा तो नहीं कि मामला आधी हकीकत, आधे फसाने का हो? आप जानते हैं, राजनेता और राजनीतिज्ञ पिछले साढ़े छह दशकों से हमारे सपनों को छलते आए हैं।
उजली सुबह के आश्वासनों के साथ जो चुनाव लड़े गए, वे हर बार निराशा का गहरा अंधकार लेकर आए। 1977 का चुनाव कुछ पुराना पड़ गया है, पर इस खौफनाक सिलसिले का पर्दाफाश यहीं से शुरू हुआ। उन दिनों गैर कांग्रेसवाद का नारा लगाते हुए तमाम दल एकजुट हो गए और आपातकाल से घबराई जनता ने उन पर भरोसा कर लिया। भावुक हिन्दुस्तानियों को लगा कि आजादी के 30 साल बाद लोकतंत्र का असली सूरज उदित हुआ है। पर यह क्या! पुराने कांग्रेसी ही सत्ता के शीर्ष पर थे। बरसों नेहरू-इंदिरा मंत्रिमंडल में शामिल रहे मोरारजी ने गद्दी हथिया ली। इससे जगजीवन राम और चरण सिंह पर घड़ों पानी पड़ गया। जिस कांग्रेसी वंशवाद का विरोध कर चौधरी चरण सिंह ने लोगों के दिलों में जगह बनाई थी, उसी कांग्रेस की तथाकथित वंशवादी नेता इंदिरा गांधी के सहयोग से मोरारजी की सरकार गिराकर वह कुछ दिनों के लिए कुरसी पर काबिज हुए।
उनके सियासी कुनबे में भारी फूट थी, इसका लाभ इंदिरा गांधी ने उठाया। चौधरी साहब का उत्थान और पतन, दोनों राजनेताओं के लिए सबक थे। पर हमारे नेता आसानी से कुछ नहीं सीखते। कमाल देखिए! 1989 से 91 के बीच वही कहानी फिर दोहराई गई। एक बार फिर कांग्रेस से निकले वीपी सिंह ने गैर कांग्रेसियों की मदद से अल्पजीवी सरकार बनाई। पिछली बार चरण सिंह असंतुष्ट हुए थे। इस बार चंद्रशेखर की बारी थी। जनता पार्टी की तरह ही राष्ट्रीय मोर्चा सरकार भी कुछ ही महीनों में धराशायी हो गई और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन गए।
सच है कि वीपी से लेकर नरसिंह राव तक प्रधानमंत्री पद की गरिमा बार-बार, तार-तार हुई। बाद में देवगौड़ा और गुजराल के समय में भी देश इसी तकलीफ से गुजरता रहा। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी का दौर आया। वाजपेयी हमेशा विपक्ष की राजनीति करते रहे थे। जनता पार्टी की छोटी-सी हुकूमत छोड़ दें, तो वह कभी सरकार में शामिल नहीं हुए थे। लोगों के मन में बड़ा संदेह था।
इतने लंबे समय तक विपक्ष की बेंचों पर बैठा शख्स किस तरह सार्थक भूमिका निभाएगा? वाजपेयी उम्मीद से कहीं बेहतर प्रधानमंत्री साबित हुए। उन्होंने हमारी विदेश नीति को नया रंग-रोगन दिया और आयाराम-गयाराम की सरकारों से आजिज आ चुके देश को स्थायित्व का सुकून प्रदान किया। उनका व्यक्तित्व कई समकालीन नेताओं के मुकाबले विराट था। इसके साथ ही उनमें विचार व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता थी। इसलिए वह अपना निजी सम्मान बचा सके। यह बात अलग है कि उन्हें भी क्षेत्रीय दलों से समझौता करना पड़ा, जिसकी कीमत खुद वह और भाजपा चुका रहे थे। तीन देवियों, यानी ममता, जयललिता और मायावती ने उन्हें खासा छकाया। इसके बाद अजित सिंह, पासवान और करुणानिधि जैसे उनके पार्टनर थे। ये लोग हवा के रुख के साथ अपनी निष्ठाएं बदलते रहे हैं। मौजूदा चुनाव में भी उनका यही रवैया है। अटल जी के बाद आए मनमोहन सिंह। इसमें कोई दो राय नहीं कि उनकी पहली पारी बहुत शानदार थी, पर दूसरी को जैसे पहले ही क्षण से अधरंग हो गया था।
पार्टी में नई पीढ़ी उदित हो रही थी। दूसरी जीत ने कई कांग्रेसियों को बड़बोला बना दिया था। साथ ही सहयोगी दल अपने समर्थन की कीमत वसूल रहे थे। नरसिंह राव के बाद यह पहला मौका था, जब भ्रष्टाचार के किस्से रस ले-लेकर सुनाए जा रहे थे। एक ईमानदार प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों की धन लिप्सा से अपनी छवि को मटियामेट होता देख रहा था। इस बीच समय भी बदल गया था। सोशल मीडिया लोगों का गुस्सा जाहिर करने का हथियार बन गया था और सिविल सोसायटी नए औजारों के साथ समक्ष खड़ी थी। अन्ना हजारे ने जब लोकपाल के लिए आंदोलन छेड़ा, तो उन्हें मिलने वाला सहयोग यथास्थितिवादियों के लिए खतरे की घंटी था।
अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह एक ही पलड़े में रखे जा सकते हैं। दोनों ही ईमानदार और काबिल हैं, पर साथियों की लालची प्रवृत्ति ने उनके दामन को रह-रहकर दागदार किया। यहां सवाल उठता है कि क्या गठबंधन की राजनीति ही तमाम बलाओं की जड़ है? क्या किसी एक दल को ही बहुमत मिलना चाहिए, ताकि वह अपने एजेंडे को लागू कर सके? यदि हां, तो इतने विशाल देश में, जहां तमाम भाषाएं, वर्ण, जातियां, संप्रदाय और क्षेत्रीय अनिवार्यताएं हैं, वहां यह हो कैसे? पर लोगों को सपने देखने से नहीं रोका जा सकता।
बचपन मे मुझे मेरे शिक्षक ने बताया कि लिखने से याद्दाश्त मजबूत होती है तब से लेखन का सिलसिला जारी है
Monday, 10 March 2014
आजादी से लेकर आज तक जनता आज तक नहीं जीत पाई, क्या अब भी कुछ ऐसा ही होने वाला है?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment