Thursday, 6 March 2014

हमारे भारत में सांसदों की संख्या हजार होनी चाहिए

��मेरा तो मानना है कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए।

��भारत की जनतान्त्रिक व्यवस्था व चुनाव प्रणाली में जो भी वास्तविक या काल्पनिक विसंगतियाँ हैं उन पर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। हम कभी अमेरिका की नकल पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली की माँग उठाते हैं, तो कभी जर्मनी की तर्ज पर आम चुनाव करवाने की वकालत करते हैं। लेकिन अपने विधान मण्डलों को भी कैसे ज्यादा उत्तरदायी बनाया जा सकता है इस पर हमने शायद ही कभी विचार किया हो। अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी आदि देशों में जो व्यवस्था लम्बे समय से चली आ रही है उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि वहाँ जनसंख्या लगभग स्थिर है। इसके विपरीत भारत में लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण अनुपातहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। एक लोकसभा सदस्य से कैसे उम्मीद की जाये कि वह पच्चीस या तीस लाख जनता का प्रतिनिधित्व सही ढंग से कर पाएगा? इसी तरह विधानसभा सदस्यों पर भी 1952 के मुकाबले आज चार गुना अधिक जनता का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। यहाँ इस विपर्यय पर भी ध्यान जाता है कि कई जगह नगरीय निकायों में चुने गये प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दिल्ली नगर निगम को एक साल पहले ही तीन में हिस्सों बाँट दिया गया है। गरज यह कि जो फार्मूला नगर निगम के स्तर पर उपयोगी है उसे प्रदेश व देश के स्तर पर किस रूप में कहाँ तक उपयोगी है इस पर चर्चा करना लाजिमी है।
मेरा तो मानना है कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए। अगर बारह सौ हों तो और बेहतर। इसे लेकर कुछ साल पहले बहस चली थी जो आगे नहीं बढ़ पाई। जिन राज्यों की जनसंख्या स्थिर है उन्हें आशंका थी कि लोकसभा का स्वरूप वृहद् हो जाने से उनके महत्व में कमी आ जायेगी और उनकी बातों की अनसुनी होने लगेगी। इस चिंता में सत्य का अंश हो सकता है लेकिन बहस को वहीं के वहीं समेटने के बजाय बेहतर होता कि सभी पक्षों की आशंका और आपत्तियों का निराकरण कैसे हो इसे ध्यान में रखकर बहस आगे बढ़ाई जाती।

��इस सन्दर्भ में आज हमारे संसद सदस्यों और विधायकों पर कितना शारीरिक और मानसिक दबाव है इस ओर हमारी तवज्जो जाना चाहिए। यह सच है कि निर्वाचित प्रतिनिधि सदन की कार्रवाई में वांछित रुचि नहीं लेते। इस पर उनकी लगातार आलोचना भी होती है किन्तु दूसरी तरफ अपने क्षेत्र की जनता से बचने का कोई उपाय उनके पास नहीं है। वे मतदाताओं की नाराजगी झेलने की जोखिम उठाने में खुद को असमर्थ पाते हैं। अपने क्षेत्र में एक दिन में उन्हें कितने लोगों से मिलना होता है, कितने कार्यक्रमों में शिरकत करना पड़ती है, कितने आवेदन पत्र उन्हें मिलते हैं इसका मानो कोई हिसाब ही नहीं है। अमूमन जब हम उनके कामकाज की समीक्षा करते हैं तो उनकी इस मजबूरी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। सोचिए कि आज यदि एक विधायक को दो लाख की जगह उसके आधे याने एक लाख जनता की नुमाइंदगी करने की व्यवस्था हो तो फिर उनसे सभी मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है या नहीं??������

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