किसी भी चुनाव से पहले हिंदुत्व के नाम पर राममंदिर, २००२ के गुजरात दंगे, धारा ३७० आदि अनेक विषय जिनका मुख्यतः हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों से सम्बन्ध है उछाले जाते हैं. देश की सभी राजनीतिक पार्टियां दो मुख्य गुटों में लामबंद हो जाती हैं, जबकि हिन्दू-मुस्लिम दंगों को लेकर दोनों गुटों के रिकोर्ड्स में ख़ास अंतर नहीं है. उपरोक्त विषयों का इस देश की सभ्यता से कोई लेना-देना ही नहीं है.
आपसीसंबंधों को बनाए रखने का काम भी युवा विद्यार्थी ही करें. विद्यार्थी इस बात को गहराई से समझें कि राजनीतिज्ञों की वोट-बैंक पोलिटिक्स इस व्यवस्था के लिए जहर से कम नहीं होगी.
मुज़फ्फ़रनगर का हत्याकांड और अल्पसंख्यकों का विस्थापन बताता है कि फ़ासीवादी शक्ति किस तरह से रूढि़-पोषक खाप पंचायतों, हरित क्रांति तथा पुरुष सत्तावाद के आधार पर खड़ी राजनीति और प्रतिक्रियावादी सामाजिक संस्थाओं से तालमेल बिठाकर उन्हें अपने नियंत्रण में लेती है। उन्होंने नियोजित तरीक़े से ‘लव जिहाद’ का दुष्प्रचार करके सांप्रदायिकता को बहू-बेटी की इज्ज़त का मामला बनाया और एक साथ वर्गीय और जेंडर हिंसा का षडयंत्र रचा, जिसमें हम आज़ादी के बाद सम्पन्न हुये भूस्वामी वर्ग और पूँजीपति वर्ग की आपसी सुलह और कारस्तानियों का सबसे भद्दा रूप देख सकते हैं।
जिस आसानी से और बिना किसी जवाबदेही के भारतीय राज्य, विरोधी आवाज़ों को दबाता जा रहा है, जिस तरह आतंकवाद की झूठी आड़ में निरपराध मुस्लिम नवयुवकों को गिरफ्तार कर लेता है और माओवाद के नाम पर किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता को पकड़ लेता है और यातनाएं देता है, जिस तरह श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ायी जाती हैं, लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों को जिस तरह कुचला जाता है, जिस तरह से बड़े पैमाने पर कश्मीर और उत्तरपूर्व के राज्यों में मानवाधिकार हनन हो रहा है, दलितों और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के मामलों में सरकारी तंत्र कोई कार्रवाई करने के बजाय हमलावरों के बचाव में जिस तरह लग जाता है, और कॉरपोरेट मीडिया तंत्र लोगों को इन चीज़ों की ख़बर तक नहीं देता, यह सब न केवल यह दर्शाता है कि हमारे समाज और राजनीति का संकट गंभीर रूप अखि्तयार कर चुका है बल्कि यह भी बताता है कि हमारे इस संवैधानिक-लोकतांत्रिक निज़ाम के अंदर ही इन सब चीज़ों के लिये गुंजाइश बन चुकी है और यह निज़ाम अब इसी दिशा में आगे जाये, इसकी तैयारी भी पूरी है। मौजूदा फ़ासीवादी मुहिम राज्य की इसी निरंकुशता को एक नयी आपराधिक आक्रामकता और स्थायित्व देने के लक्ष्य से संचालित है। इस संदर्भ में आने वाले आम चुनावों में फ़ासीवादी ताक़तों को नाकामयाब करना बेहद ज़रूरी है।
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