Thursday, 13 February 2014

Saffron terrorism

हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं के आतंकी नेटवर्क
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स्वामी असीमानंद मालेगांव, मक्का मस्जिद, हैदराबाद, अजमेर दरगाह और समझौता एक्सप्रेस में हुये धमाकों के कथित मुख्य कर्ताधर्ता बताये जाते हैं। ये धमाके सन् 2006 से शुरू हुये थे और उनने देश को हिलाकर रख दिया था। इन धमाकों की शुरूआती जाँच का नेतृत्व हेमंत करकरे ने किया था, जिन्हें 26/11/2008 को मुंबई में हुये आतंकी हमले में मार डाला गया। बाद में राजस्थान पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते ने इस जाँच को अपने हाथों में लिया और कड़ी मेहनत के बाद हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं के आतंकी नेटवर्क का खुलासा किया, जिसका संचालन आरएसएस से जुड़े या उसकी विचारधारा में विश्वास रखने वाले विभिन्न संगठन कर रहे थे। इस नेटवर्क के कई सदस्य अब जेल में हैं। हाल (जनवरी 25, 2014) में असीमानंद और तीन अन्यों पर समझौता एक्सप्रेस धमाकों के सिलसिले में औपचारिक रूप से आरोप लगाए गये। असीमानंद आरोपी क्रमांक 1 हैं।
अपनी गिरफ्तारी के बाद उन्होंने एक मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष इकबाल-ए-जुर्म किया था। यह इकबाल-ए-जुर्म पूरी तरह ऐच्छिक था और मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट दीपक डबास के समक्ष 18 दिसंबर को तीस हजारी अदालत में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज कराया गया था। स्वामी ने किसी भी प्रकार की विधिक सहायता लेने से इंकार कर दिया था और उनका बयान उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के 48 घंटे बाद कराया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे किसी प्रकार के भय या दबाव में नहीं है। इस बयान में उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे और अन्य हिन्दू कार्यकर्ता, मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर बम विस्फोटों में शामिल थे और उन्होंने ये विस्फोट इसलिये कराए थे क्योंकि वे इस्लामिक आतंकवाद को ‘बम के बदले बम’ का प्रतिउत्तर देना चाहते थे। यह इकबालिया बयान 42 पृष्ठों का था और उसके बारे में मीडिया में काफी कुछ छपा था।
बाद में वे अपने इस बयान से पीछे हट गये और उन्होंने यह आरोप लगाया कि उन्हें डरा धमका कर बयान देने पर मजबूर किया गया था। उनका यह दावा आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय था। हम सब जानते हैं कि पुलिस के समक्ष दिये गये बयान अक्सर दबाव या डर के कारण दिये जाते हैं परन्तु जज के सामने दिये गये बयानों के मामले में अमूमन ऐसा नहीं होता। बयान देने के पहले वे 48 घंटे तक जेल में थे और उन्हें पूरे मसले पर विचार करने का पर्याप्त समय था। ऐसा लगता है कि वे जानबूझकर अपने बयान से पलट गये क्योंकि वे अपने साथियों और अपने पितृ संगठन को बचाना चाहते थे।
यह घटना हमें महात्मा गांधी की हत्या के मुकदमे के दौरान नाथूराम गोडसे द्वारा दिये गये बयान की याद दिलाती है जिसमें उसने यह दावा किया था कि उसका आरएसएस से कोई सम्बंध नहीं है। बाद में उनके भाई गोपाल गोडसे ने एक साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने आरएसएस से अपने सम्बंधों से इसलिये इंकार किया था क्योंकि वे संघ के अपने साथियों को बचाना चाहते थे। स्वामी भी विधिक सहायता प्राप्त करने के बाद अपने बयान से पीछे हट गये।
अब एक बार फिर उन्होंने वैसी ही पल्टी खाई है। ‘केरेवेन‘ में प्रकाशित उनके साक्षात्कार से देश भर में बवाल मचने के बाद उन्होंने यह कह दिया कि पत्रिका के संवाददाता को दिये गये साक्षात्कार में उन्होंने वह नहीं कहा था, जो कि उनके हवाले से छापा गया है। पत्रिका के संपादक और सम्बंधित रिपोर्टर ने यह दावा किया है कि जो छापा गया है, वह ठीक वही है जो स्वामी असीमानंद ने कहा था। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में साक्षात्कार की ऑडियो रिकॉर्डिंग के कुछ हिस्से भी जारी किये हैं। केरेवेन में प्रकाशित साक्षात्कार से न सिर्फ यह सिद्ध हो गया है कि स्वामी का इकबालिया बयान सही था वरन् इससे कई नए तथ्य भी उजागर हुये हैं। यह साक्षात्कार धमाकेदार है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि आतंकी नेटवर्क के तार आरएसएस के मुखिया तक से जुड़े हुये थे। केरेवेन में प्रकाशित खबर कहती है

‘‘…जिस षड़यंत्र में असीमानंद शामिल थे, उसका विवरण शनैः शनैः और विस्तृत होता गया।

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