Tuesday, 18 February 2014

Hindutwa


"हिंदुत्व" का एजेंडा ही मात्र एक विकल्प रह गया है राजनीतिक दलों के नेताओं का?

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हिन्दुत्व की अस्मिता के सिवाय सारी पहचान बेकार है। पक्ष-विपक्ष से लेकर सारे विकल्प हिन्दुत्व के हैं। नरम या गरम या छद्म हिन्दुत्व के कॉरपोरेट विकल्प।
दूध का जला छाछ भी फूँककर पीता है। लेकिन बिना जाँच पड़ताल के हम लोग अगिनखोर हैं।
आतंक के विरुद्ध युद्ध और हिन्दुत्व के पुनरुत्थान के दंश तो झेल ही रहे हैं लेकिन पिछले बीस साल से इस मुक्त बाजार में कॉरपोरेट अश्वमेध के खिलाफ नपुंसक आक्रोश के अलावा हमारा कोई जवाब नहीं है।
चीखें और सिसकियाँ रोज ब रोज तेज होती जा रही हैं और तेज होती जा रही हैं,हिमालय से कन्याकुमारी तक विस्तृत केदार आपदाओं की बारम्बारता पुनरावृत्त हो रही हैं।
दसों दिशाओं में विकास के नाम तबाही का आलम है।
हम लोग धर्मोन्मादी अंध राष्ट्रभक्त। जबकि देश बेचो महाब्रिगेड का किसी भी स्तर पर कोई प्रतिरोध हो ही नहीं रहा है।
इनके मध्य हम कहां हैं, मुझे अपना अवस्थान सही-सही मालूम ही नहीं पड़ रहा है। आपको अपना अवस्थान और परिप्रेक्ष्य साफ-साफ मालूम हो तो हमारी मदद जरूर करें। क्या यह असम्भव है कि ये तमाम लोग एक साथ संगठित करके इस देश की व्यवस्था ही बदल दें??

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