टेरर गुरू असीमानन्द को लेकर अस्पष्टता आज तक चली आ रही है। उदाहरण के तौर पर देखें कि
क्यों आज तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने असीमानन्द को दिये गये सम्मान- स्पेशल गुरूजी सम्मान- को वापस नहीं लिया जो उसे ‘संघ की निष्ठा से सेवा’ करने के लिये गोलवलकर की जन्मशती पर दिया गया था (2005) ?
आखिर क्यों आज तक संघ से जुड़े वकील उसे कानूनी सहायता प्रदान कर रहे हैं, जब जोधपुर की अपनी पाँच दिनी बैठक के बाद (2010) -जबकि पुलिस ने उसके कई सारे कार्यकर्ताओं को आतंकी घटनाओं में संलिप्तता के चलते जेल में डाला था- उसने यह ऐलान किया था कि वह ऐसी गतिविधियों में मुब्तिला पाये गये किसी को कानूनी सहायता प्रदान नहीं करेगी ?
वे ‘बुरे तत्व’ कौन थे जिनके बारे में संघ ने जोधपुर मीटिंग के बाद सफाई दी थी, जिन्होंने या तो ‘संगठन को त्याग दिया’ या ‘जिन्हें संघ छोड़ने के लिये कहा गया’ और क्यों आज तक संघ से जुड़े और समविचारी संगठनों ने मिल कर – इस आपराधिक और आतंकी गठजोड से तौबा नहीं किया अर्थात् अपने सम्बन्धों की समाप्ति का ऐलान नहीं किया।
संघ-भाजपा नेताओं से असीमानन्द की नज़दीकी के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। डांग जिले में जब असीमानन्द सक्रिय था तब उसके द्वारा आयोजित शबरी कुंभ में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संघ के पूर्व सुप्रीमो के एस सुदर्शन, और वर्तमान सुप्रीमो मोहन भागवत ने हाजिरी लगायी थी। इण्टरनेट पर ऐसे तमाम फोटोग्राफ्स आसानी से उपलब्ध है जो बताते हैं कि किस तरह संघ-भाजपा के यह तमाम महारथी असीमानन्द के आतिथ्य का लाभ उठाते रहे हैं। यह अकारण नहीं था कि नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली गुजरात सरकार ने संघ द्वारा ‘ढूँढे’ इस नए कुंभ के लिये आसानी से फंड उपलब्ध कराए।
अब जहाँ तक संघ का नज़रिया है, तो असीमानन्द का रिकॉर्ड ‘शानदार’ ही था। गुजरात के आदिवासीबहुल डांग में ‘ईसाई मिशनरियों के खिलाफ संघर्ष’ करने के पहले, उसने संघ की तरफ से कई स्थानों पर काम किया था और वह अंदमान में भी सक्रिय रहा था। निश्चित ही संघ के कर्णधारों के लिये यह सोचना भी मुश्किल रहा होगा कि अलसुबह वह अपने तथा अपने सहकर्मियों के अपराधों को लेकर मैजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 के अन्तर्गत लिखित स्वीकृति देगा – जिसे अदालत में सबूत के तौर पर रक्खा जा सकेगा। और इस अपराध स्वीकारोक्ति के बाद संघ के लिये हालात चुनौतीपूर्ण होने वाले थे।
असीमानन्द ने ‘कारवां’ पत्रिका में दिया साक्षात्कार इसकी महज एक बानगी मात्रा है। शायद संघ के समझदारों को समझना होगा कि वह किसी पत्रिका में छपे पन्नों को सिरेसे खारिज कर सकते हैं, मगर जब तक वह हिन्दुत्व आतंकी की खतरनाक परिघटना के सभी आयामों को लेकर अपनी कथित संलिप्तता के मामलों को सीधे सम्बोधित करने की कोशिश न करें, उन्हें उन सवालों का सामना बार बार करना होगा।
त्व आतंकियों- लेफ्टिनन्ट कर्नल पुरोहित और शंकराचार्य दयानन्द पाण्डेय- से अपनी दूरी बना ले, तो यह फायदे का सौदा है; मगर वह इस छोटेसे प्रश्न का जवाब देने के लिये तैयार नहीं दिख रहा था कि आखिर वर्ष 2008 में वहीं संघ और उसके आनुषंगिक संगठन इन्हीं आतंकियों के एवं उनकी आतंकी मोडयूल का समर्थन करने के लिये आमादा थे। क्या इस बात को भूला जा सकता है कि जब इन आतंकियों – साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, पुरोहित, शंकराचार्य दयानन्द पाण्डेय, रमेश उपाध्याय आदि – को पुणे और नासिक की अदालत में पेश किया जा रहा था, तब उन पर पुष्पवर्षा करने के लिये इन्हींे हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ता वहाँ सैंकड़ों की तादाद में एकत्रित थे।
बचपन मे मुझे मेरे शिक्षक ने बताया कि लिखने से याद्दाश्त मजबूत होती है तब से लेखन का सिलसिला जारी है
Thursday, 20 February 2014
हिंदुत्व टेरर असीमानंद और संघ
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