Wednesday, 19 February 2014

कई दशकों से मुसलमानों पर आतंकवाद का लेबल चिपकाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों ने देश में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा मगर सच्चाई को सामने आना होता है ।

आतंकी बम विस्फोटों के लिये गिरफ्तार असीमानन्द के कैरवान में प्रकाशित साक्षात्कार के बारे में भाजपा नेताओं ने इसे काँग्रेस के डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेन्ट का कारनामा बताया है। यह आरोप उस जगह से लगाया जा रहा है जहाँ इस डिपार्टमेन्ट का स्थापना स्थल और हैड क्वार्टर है। भाजपा के फूले से दिखते गुब्बारे में सारी हवा इसी डिपार्टमेन्ट के पम्प से भरी गयी है और यह काम आज से नहीं अपितु जनसंघ के समय से किया जा रहा है। आर एस एस को वर्षों से रयूमर स्पाँसरिंग संघ [अफवाह फैलाऊ संघ] के नाम से भी जाना जाता रहा है। पहले ये लोग मौखिक प्रचार के द्वारा अफवाहें फैलाते थे और बाद में कल्पित आईडी से सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने और गाली गलौज का काम करने लगे। अपनी पहचान को छुपा कर रखना ही इनके अपराधबोध का प्रमाण है।
पर सबसे पहले इस विषयगत साक्षात्कार को लिया जाये। कैरवान दिल्ली प्रैस प्रकाशन समूह की पत्रिका है। इस समूह की प्रमुख हिन्दी पत्रिका सरिता समेत इसमें प्रकाशित सम्पादकीय टिप्पणियों को देखा जाये तो हम पाते हैं कि यह समूह कभी भी काँग्रेस का पक्षधर नहीं रहा है अपितु अधिकतर घटनाओं में इसकी सहमति भाजपा के साथ बनती रही है। इसके संस्थापक विश्वनाथ तो मुक्त कण्ठ से अटलजी के प्रशंसक रहे हैं और वामपंथ की ओर प्रतीत होते झुकाव के आरोप वाले दिनों में इन्दिरा गान्धी की रीतिनीति से गहरी असहमतियाँ प्रकट करते रहे हैं। अब जब कैरवान की किसी पत्रकार द्वारा गत दो वर्षों के दौरान लिये गये कथित साक्षात्कार से संघ परिवार को असुविधा हो रही है तब उसके लिये काँग्रेस को जिम्मेवार ठहराना और उसके पास गलत हथकण्डे वाला एक विभाग होने का मनगढ़न्त आरोप लगाना बिल्कुल ही दूसरी बात है। स्मरणीय है कि पिछले दिनों जब भी काँग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने संघ परिवार के बारे में कुछ कहा है तो भाजपा ने उनके बयान का उत्तर देने की जगह उनके पास डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेन्ट का होना बताया था व छद्म पहचान वाले लोगों से सोशल मीडिया पर गाली गलौज करवाना शुरू करते रहे हैं। रोचक यह है कि जब पत्रकारों ने उनसे उक्त घटना के बारे में जाँच करने की माँग के बारे में सवाल किये तो उनके प्रवक्ताओं ने जाँच की माँग के प्रति कोई रुचि नहीं दर्शायी। स्मरणीय यह भी है कि आज से कुछ साल पहले तक संघ परिवार के लिये आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा होता था किन्तु जैसे ही असीमानन्द, दयानन्द पांडे, प्रज्ञा सिंह आदि की गिरफ्तारियों के माध्यम से आतंकी घटनाओं के नेपथ्य के दृष्य सामने आये तब से इन्होंने आतंकवाद को खतरा बताना बन्द कर दिया। राजनीति में हिंसा का सहारा लेना एक विचार हो सकता है और जो लोग इस विचार में विश्वास रखते हैं वे इसका खतरा उठाने के लिये भी तैयार रहते हैं किन्तु अपने किये हुये काम से मुकरना और उसकी जिम्मेवारियाँ दूसरों पर डालना एक अपराध है जो डर्टी ट्रिक्स में आता है। मालेगाँव के गैर मुस्लिम आरोपियों के यहाँ मुसलमानों जैसी पोषाकें और नकली दाढ़ियाँ भी बरामद की गयी थीं व मडगाँव में आरोपी किसी हिन्दू समारोह में साइकिल पर बाँध कर बम विस्फोट करके हिन्दुओं को उत्तेजित कर साम्प्रदायिक दंगे करवाना चाहते थे किन्तु दुर्भाग्य से वह विस्फोट समयपूर्व ही हो गया और रहस्य खुल गया था। अगर ये डर्टी ट्रिक्स नहीं थीं तो आतंकवाद को देश की प्रमुख समस्या बताने वाले दिनों में उन्होंने इसकी निन्दा तक करने की जरूरत क्यों नहीं समझी?
ज़िस गुजरात का ये बार बार गुणगान करते हैं उसके तीन हजार लोगों की मौत के अगर ये जिम्मेवार नहीं थे तो इन्होंने इन हत्याओं के अपराधियों को पकड़ने के लिये अपने प्रचारित प्रशासनिक कौशल का उपयोग क्यों नहीं किया और बाद में जिन लोगों को अदालत ने दोषी माना व सजायें दीं उन्हें टिकिट देने ही नहीं अपितु मन्त्री बनाने तक में संकोच नहीं किया। क्या उनकी जानकारियाँ इतनी कम थीं कि जिस सत्य को सारी दुनिया जान गयी हो उसे वहाँ की सरकार नहीं जानती थी।

डर्टी ट्रिक्स का यह खेल भाजपा के जनसंघ काल से ही जारी है। इसी अफवाह फैलाऊ संघ के दुष्प्रचार का परिणाम ही महात्मा गान्धी की हत्या थी और आज़ादी के बाद जब देश में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास की नींव रखी गयी तब इन्होंने न केवल खाद के उपयोग के खिलाफ वातावरण बनाया था अपितु पनबिजली योजनाओं के खिलाफ किसानों के बीच यह प्रचार भी किया कि ये सरकार पानी में से बिजली निकाल लेती है जिससे वह सिंचाई के लिये अनुपयुक्त हो जाता है। जब काँग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी या गाय बछड़ा हुआ करता था और मतपत्रों पर क्रॉस का निशान लगाकर मतदान होता था तब ये अफवाहें फैलाते थे कि किसी पशु को जब वध के लिये ले जाया जाता है तब उस पर क्रॉस का निशान बनाया जाता है और काँग्रेस को वोट देने का मतलब गौवंश की हत्या के पाप का भागीदार होना है। कम्युनिस्टों के खिलाफ ये प्रचार करते थे कि वे देश और धर्म द्रोही होते हैं । कुल मिलाकर देश को ब्रिटिश एजेंट ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने देश के विनाश की जिम्मेदारी पूरी वफादारी से की।

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