क्या राजनीतिक दलों का इस तरह का मेल-मिलाप केवल चुनावी लाभ के लिए ही होता है?
अभी कल तक रामविलास पासवान और उनके साथी न केवल भाजपा को सांप्रदायिक बताते थे, बल्कि उसे भारत जलाओ पार्टी की संज्ञा भी देते थे। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के तो वह कटु आलोचक थे और खुद को पंथनिरपेक्ष साबित करने के लिए यह भी रेखांकित करते थे कि वह गुजरात दंगों के कारण ही राजग से अलग हुए थे।
हालांकि अब उनके पास यह एक मजबूत तर्क है कि मोदी को गुजरात दंगों के मामले में अदालत से क्लीनचिट मिल गई है, लेकिन शायद ही उन्होंने कभी अदालत के फैसले का इंतजार करने की बात कही हो। दरअसल हमारे राजनेता अपनी सुविधा के लिए कोई न कोई आड़ खोज ही लेते हैं। उनकी इसी प्रवृत्तिके चलते गठबंधन राजनीति अवसरवाद का पर्याय बन गई है। यह सही है कि लोजपा के फिर से भाजपा के साथ जुड़ने से नरेंद्र मोदी को अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में मदद मिलेगी, लेकिन यह सवाल तो उठेगा ही कि क्या भाजपा को बिहार में सचमुच में लोजपा सरीखे दल के सहारे की जरूरत थी?
भले ही अब भाजपा यह दावा करे कि उसने बिहार में एक सहयोगी तलाश लिया है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि रामविलास पासवान कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं हैं। लोजपा राजनीतिक रूप से एक डूबती हुई नैया बनी हुई थी। यही कारण है कि पहले पासवान ने राजद और कांग्रेस से जुड़ने की कोशिश की और जब उन्हें वहां अपेक्षित महत्व नहीं मिला तो वह भाजपा के साथ आ खड़े हुए। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि भाजपा बिहार में अपने लोगों के उन स्वरों की अनसुनी कर रही है जो इस मेल-मिलाप के खिलाफ हैं। उसके तमाम पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ नेताओं को यह मेल-मिलाप रास नहीं आ रहा है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि भाजपा की ओर से जोर-शोर से यह दावा किया जा रहा था कि वह बिहार में अपने दम पर एक बड़ी ताकत के रूप में उभरने जा रही है। अब भाजपा नेताओं को अपने लोगों को समझाना पड़ेगा कि उसे लोजपा की जरूरत थी।
बचपन मे मुझे मेरे शिक्षक ने बताया कि लिखने से याद्दाश्त मजबूत होती है तब से लेखन का सिलसिला जारी है
Thursday, 27 February 2014
रामविलास पासवान के भाजपा से गठबंधन केवल पासवान के हित में है ना कि जनता के ?
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