हमें भूलना नहीं चाहिए कि राजीव गांधी की हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का नतीजा थी। इसे लिट्टे नेता प्रभाकरण और उनके बीच की निजी लड़ाई मानकर कमतर आंकना भूल होगी। कुछ तमिल नेता निजी स्वार्थ में ऐसा करते आए हैं।
राजीव गांधी की हत्या को 23 साल होने को आए। इस दौरान हम उनके हत्यारों को सजा दिलाने की बजाय बेबस भाव से सियासी दांव-पेच देखते आए हैं। गुजरे हफ्ते का घटनाक्रम तो और अधिक चौंकाता है, देश की आला अदालत उनकी सजा-ए-मौत को उम्र कैद में तब्दील करती है और अगले ही दिन तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता उनकी रिहाई की घोषणा कर देती हैं। हकबकाई केंद्र सरकार उसके अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाकर रिहाई पर रोक का आदेश हासिल करती है। यह सब क्यों? क्या एक पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारे टहलते हुए घर चले जाने की आजादी पा सकते हैं? अगर हम संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं, तो कुछ गुण-धर्मों का भी पालन करना होगा।
राजीव गांधी किसी राजनीतिक परिवार या पार्टी के मुखिया भर नहीं थे। वह पांच साल तक इस देश के प्रधानमंत्री रहे। जो मुल्क अपने सर्वोच्च राजनेता के हत्यारों को सजा नहीं दे सकता, वह आम आदमी की सुरक्षा की गारंटी कैसे ले सकता है? हमें भूलना नहीं चाहिए कि राजीव गांधी की हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का नतीजा थी। इसे लिट्टे नेता प्रभाकरण और उनके बीच की निजी लड़ाई मानकर कमतर आंकना भूल होगी। कुछ तमिल नेता निजी स्वार्थ में ऐसा करते आए हैं।भारत ने जब श्रीलंका में शांति सेना भेजने का फैसला किया था, उस समय दो चर्चाएं जोरों पर थीं। पहली यह कि लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन ने ‘तमिल ईलम’ के सपने में भारतीय भूभाग भी शामिल कर रखे हैं। दूसरी, रोजमर्रा के खून-खराबे से तंग आकर श्रीलंका ने नई दिल्ली से मदद की गुहार लगाई और यह संकेत भी दिया कि अगर भारत मदद नहीं करेगा, तो हम पाकिस्तान अथवा चीन के दरवाजे खटखटाएंगे। भला कौन भारतीय प्रधानमंत्री चीन अथवा पाकिस्तान की फौजों को श्रीलंका में दाखिल होने की अनुमति देगा? लंबे समय से इन दोनों देशों से लगी सीमाएं सुलगती रही हैं। अगर इनकी श्रीलंका से सामरिक संधि हो जाती, तो हिन्दुस्तान सैंडविच बनकर रह जाता। जाहिर है, नौजवान प्रधानमंत्री के पास बहुत कम विकल्प थे।
आप याद कर सकते हैं, राजीव गांधी ने बेहद कठिन समय में सत्ता संभाली थी। उनकी मां इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री आवास में ही उनके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी। इस खौफनाक हत्याकांड का ताना-बाना सीमा पार बैठे सैन्य विशेषज्ञों ने बुना था। 31 अक्तूबर, 1984 का वह सवेरा इस देश के सामने सीधी चेतावनी लेकर उपस्थित हुआ था। हमारी प्रभुसत्ता खतरे में थी। साफ हो गया था कि सरहद पार से आने वाली इमदाद के सहारे कुछ भटके हुए लोग अपने इरादों के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। उधर, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भी दहशतगर्दों के प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ था। राजीव को इस तीर्थस्थल की पवित्रता की रक्षा के लिए तमाम कूटनीतिक, राजनीतिक और रणनीतिक मशक्कत करनी पड़ी। ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ को आज कोई याद नहीं करता, पर इसी कार्रवाई ने पंजाब में आतंकवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोकी थी।
राजीव गांधी को उत्तर-पूर्व में परंपरागत तौर पर चले आ रहे अलगाववाद से भी निपटना पड़ा। इसके लिए उन्होंने ललडेंगा से समझौता किया और तमाम ऐसे कदम उठाए, जिनकी वजह से आज सतबहनी के राज्यों में अमन है। उनकी अगली परेशानी तमिलनाडु में पनप रही आतंकवादी गतिविधियां थीं। यह सच है कि उनके द्वारा लिए गए फैसलों की वजह से देश के एक बड़े भूभाग में शांति और व्यवस्था कायम हो सकी। इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
क्या ऐसे शख्स की शहादत निर्थक जानी चाहिए? यह व्यवस्थागत दोष है कि भारत आतंकवाद के मामलों में अपेक्षित तेजी और सख्ती नहीं बरत पाता।
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